Bachendri Pal Wiki Biography in Hindi | बछेंद्री पाल का जीवन परिचय

Bachendri Pal Wiki Biography in Hindi | किसी भी कार्य को करने के लिए विश्वास होना जरुरी है. विश्वास के दम पर ही व्यक्ति अपने सपनों को सच कर सकता है और इसी विश्वास के कारण ही बछेंद्री पाल ने विश्व की सबसे ऊंची छोटी पर साल 1984 में कदम रखा था. इस चोटी पर कदम रखते ही वो पहली ऐसी भारतीय महिला बन गई थी, जिसने एवरेस्ट के अभियान को सफलता के साथ पूरा किया था.

Update: 2021-01-06 08:08 GMT

Bachendri Pal Wiki Biography in Hindi | बछेंद्री पाल का जीवन परिचय

बछेंद्री पाल की जीवनी | Bachendri Pal Biography in Hindi First Indian Female to climb Mount Everest

Bachendri Pal Wiki Biography in Hindi | किसी भी कार्य को करने के लिए विश्वास होना जरुरी है. विश्वास के दम पर ही व्यक्ति अपने सपनों को सच कर सकता है और इसी विश्वास के कारण ही बछेंद्री पाल ने विश्व की सबसे ऊंची छोटी पर साल 1984 में कदम रखा था. इस चोटी पर कदम रखते ही वो पहली ऐसी भारतीय महिला बन गई थी, जिसने एवरेस्ट के अभियान को सफलता के साथ पूरा किया था.

हमारे देश की हर लड़की के लिए बछेंद्री पाल का जीवन एक प्रेरणा जनक है और इनके जीवन से हमें काफी कुछ सीखने को मिला सकता है. इसलिए आज हम आपको इस पर्वतारोही के जीवन के बारे में बताने जा रहे हैं. ताकि इनके जीवन की कहानी पढ़कर आपको भी अपने सपनों को सच करने के लिए प्रेरणा मिले सके.

बछेंद्री पाल से जुड़ी जानकारी (Bachendri Pal personal details)

  • पूरा नाम बछेंद्री पाल
  • जन्म स्थान नाकुरी, उत्तरकाशी, उत्तराखंड
  • जन्म तारीख 24 मई, 1954
  • रेजिडेंट जमशेदपुर, झारखंड
  • धर्म हिंदू
  • पिता का नाम किशन सिंह पाल
  • माता का नाम हंसा देवी
  • कुल भाई 2
  • कुल बहन 2
  • पेशा पर्वतारोही और टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन की प्रमुख
  • किस साल की एवरेस्ट की चढ़ाई 23 मई, 1984 (30 वर्ष की आयु में)
  • एजुकेशन क्वालिफिकेशन बी.एड, संस्कृत भाषा में एम.ए और नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (एनआईएम)
  • वैवाहिक स्थिति (Marital status) –
  • आंखों का रंग (Eye colour) काला
  • बालों का रंग (Hair colour) काला

बछेंद्री पाल का परिवार (Bachendri Pal Family Details In Hindi)

बछेंद्री पाल ने भारत के उत्तराखंड राज्य के एक छोटे से गांव के एक साधारण से परिवार में सन् 1954 में जन्म लिया था. बछेंद्री पाल के परिवार में इनके माता पिता के अलावा इनके भाई बहन हैं. इनकी माता का नाम हंसा देवी है और इनके पिता का नाम किशन सिंह है. इनके पिता भारत से जाकर तिब्बत में सामान बेचा करते थे. इनकी माता हंसा एक गृहणी थी. एक ग्रामीण परिवार से नाता रखने वाली पाल अपने माता पिता की तीसरी संतान है और पाल के कुल दो बहनें और दो भाई हैं. पाल के एक भाई का नाम राजेंद्र सिंह पाल है और वो एक पर्वतारोही हैं.

बछेंद्री पाल की शिक्षा (Bachendri Pal Education)

नाकुरी गांव में जन्मी पाल का ज्यादातर जीवन इसी गांव में बिता हुआ है और अपने राज्य के ही एक सरकारी स्कूल से इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हासिल की है. पाल हमेशा से ही पढ़ाई लिखाई में तेज थी. लेकिन उस समय हमारे देश में लड़कियों की पढ़ाई पर परिवार वाले ज्यादा ध्यान नहीं देते थे. जिसके कारण बच्चियों को पढ़ाई से वंछित रहना पड़ता था. बछेंद्री पाल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. जब उन्होंने अपनी पढ़ाई को जारी रखने की बात अपने पिता के सामने रखी तो उनके पिता ने उनको आगे की पढ़ाई करवाने से साफ इंकार कर दिया था. पिता से मंजूरी नहीं मिलने के कारण पाल काफी परेशान हो गई और इन्हें अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़ने का डर सताने लगा. लेकिन पाल की मां जानती थी कि पाल अपने जीवन में कुछ अलग करने का सपना देखती हैं और पाल के इन्हीं सपनों को पूरा करवाने के लिए, इनकी मां ने पाल के पिता को समझाया कि वो पाल को आगे की पढ़ाई करने की अनुमति दे दें. जिसके बाद पाल के पिता ने पाल को आगे की पढ़ाई करने के लिए अपनी मंजूरी दे दी. पिता से पढ़ाई की अनुमति मिलने के बाद पाल ने अपना पूरा ध्यान केवल अपनी पढ़ाई पर लगा दिया और इस तरह से इन्होंने पहले बी. ए विषय में डिग्री प्राप्त की और इसके बाद संस्कृत भाषा में एम.ए में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के बाद पाल ने बी.एड की डिग्री भी हासिल की. ताकि वो एक अध्यापिका बन सकें और अपना ज्ञान बच्चों में बांट सकें.

बतौर शिक्षक किया है काम (Bachendri Pal Career)

बछेंद्री के माता पिता चाहते थे कि वो एक अध्यापिका बनें और इसलिए बछेंद्री ने अध्यापिका बनने के लिए बी.एड की पढ़ाई की थी. बी.एड की पढ़ाई पूरी करने के बाद पाल ने कुछ समय तक बतौर एक अध्यापिका के तौर पर भी कार्य किया. लेकिन कम सैलरी मिलने के कारण इन्होंने इस करियर को छोड़ने का निर्णय ले लिया. साल 1981 में शिक्षिका का करियर छोड़ने के बाद पाल ने नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग में दाखिला लेने के लिए आवेदन किया. लेकिन जब इन्होंने दाखिले के लिए अपना आवेदन किया, तो उस वक्त तक इस इंस्टीट्यूट की सारी सीटें भर गई थी. जिसके कारण पाल को इस इंस्टीट्यूट में अगले साल यानी साल 1982 में दाखिला मिला सका था. दाखिला मिलने के बाद पाल ने यहां से माउंटेनियरिंग में कोर्स किया था और अपना सारा ध्यान एक माउंटेनियरिंग बनने में लगा दिया.

पर्वतारोहण करने का मिला पहला मौका (Bachendri Pal Mountaineer Career)

माउंटेनियरिंग के कोर्स में पाल के द्वारा किए गए प्रदर्शन को काफी पसंद किया गया था और इन्हें इस कोर्स में 'ए' ग्रेड दिया गया था. अपने कोर्स को पूरा करने के दौरान ही पाल को पता चला की भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन (आईएमएफ) एवरेस्ट की चोटी पर भेजने के लिए एक दल बना रहा है और इस दल में महिलाओं की भी जरूरत है. लेकिन पाल को उस समय अपने ऊपर विश्वास नहीं था कि वो एवरेस्ट की चोटी चढ़ सकती हैं. लेकिन पाल के प्रदर्शन की बदौलत उन्हें आईएमएफ ने साल 1984 में भारत की ओर से एवरेस्ट पर भेजे जाने वाले दल के लिए चुन लिया गया. एवरेस्ट पर जाने से पहले पाल को कई सारी ट्रेनिंग दी गई थी और इन ट्रेनिंग में इन्होंने काफी अच्छा प्रदर्शन किया था.

आईएमएफ के इस अभियान में पाल के साथ कुल 16 सदस्य थे और इन 16 सदस्यों में 11 पुरुष शामिल थे और अन्य महिलाएं थीं. इस अभियान को पूरा करने के लिए ये सभी लोग 7 मार्च 1984 में दिल्ली से नेपाल के लिए रवाना हुए थे.

जानिए कैसे पूरा किया एवरेस्ट का सफर (First Indian Female to climb Mount Everest)

पाल और इनकी टीम के सदस्यों ने नेपाल पहुंचने के कुछ दिनों बाद ही अपने एवरेस्ट अभियान को शुरू कर दिया था. इस अभियान को कई चरणों में पूरा किया गया था. इस अभियान का पहला चरण बेस कैंप था. बेस कैंप से अपना सफर शुरू करने के बाद पाल और उनके साथी शिविर तक पहुंचे थे और इस शिविर की उंचाई 9, 900 फीट यानी 6065 मीटर थी. इस शिविर पर रात बिताने के बाद, अगले दिन इन सभी ने शिविर 2 की और अपना रुख किया और शिविर 2, 21,300 फीट यानी 6492 मीटर की ऊंचाई पर स्थित था. इस शिविर के बाद अगला चरण शिविर 3 था और इस शिविर की ऊंचाई 24,500 फीट यानी 7470 मीटर की थी.

वहीं जैसे- जैसे पाल की टीम ऊंचाई पर पहुंचती जा रही थी, वैसे-वैसे ही पाल की परेशानियां भी बढ़ती जा रही थी. ऊंचाई पर पहुंचने के साथ ही ठंड बढ़ती जा रही थी और इस अभियान से जुड़े सदस्यों को सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी थी. इस अभियान के लिए गए कई सदस्य तो घायल भी हो गए थे. जिसके चलते कई सदस्यों को इस अभियान को बीच में ही छोड़ना पड़ा. वहीं लाख दिक्कतों के बाद भी पाल ने हार नहीं मानी और इन्होंने अपने आगे का सफर जारी रखा और शिविर 4 की ओर अपने बचे हुए साथियों के साथ रुख किया. ये शिविर 26,000 फीट यानी 7925 मीटर स्थित था और इस शिविर तक पहुंचते –पहुंचते पाल की टीम में मौजूद सभी महिलाओं ने हार मान ली और वो यहां से ही वापस बेस कैंप चले गईं और इस तरह इस अभियान को पूरा करने के लिए भारत की और से भेजी गई टीम में केवल पाल ही एक महिला सदस्य बचीं थी.

शिविर 4 के बाद अगल पढ़ाव एवरेस्ट की चोटी थी और इस चोटी पर पाल की टीम 23 मई को पहुंचने में कामयाब हुई थी. इस चोटी पर पहुंचते ही 30 वर्षीय पाल ने एक इतिहास रच दिया और वे अपने जन्मदिन से एक दिन पहले ही भारत की पहली ऐसी महिला बन गई, जिन्होंने पहली बार एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा और हमारे देश का झंड़ा फहराया. एवरेस्ट की ऊंचाई कुल 29,028 फुट यानी 8,848 मीटर है और इस चोटी पर पाल और उनके सदस्य दिन के 1 बजकर 7 मिनट पर पहुंचे थे और इन्होंने इस चोटी पर कुल 43 मिनट बताए थे. इस चोटी से पाल ने कुछ पत्थर भी इकट्ठा किए थे, जिन्हें वो अपने साथ लेकर जाना चाहती थी और 1 बजकर 55 मिनट पर पाल और उनके सदस्यों ने इस चोटी से उतरने का अपना सफर शुरू किया था.

पाल से जुड़ी अन्य बातें (Facts About Bachendri Pal)

  1. जब पाल छोटी थी तो उनके परिवार वालों के पास इतने पैसे नहीं हुआ करते थे कि वो उनकी शिक्षा का खर्चा उठा सकें. अपने परिवार वालों के आर्थिक हालातों को समझते हुए पाल ने सूट और सलवार सिलने का काम शुरू कर दिया था, ताकि वो अपनी पढ़ाई का खर्च उठा सकें. एक सलवार और सूट को बनाने के लिए इन्हें पांच से सात रुपए मिला करते थे.
  2. पाल जब केवल 12 वर्ष की थी तब इन्होंने पहली बार 400 मीटर के एक पर्वत की चढ़ाई की थी और इस चढ़ाई को सफलतापूर्वक करने के बाद इनमें एक विश्वास पैदा हुआ था कि वो एक पर्वतारोहण कर सकती हैं.
  3. पाल के गांव में लड़कियों को उच्च शिक्षा नहीं दी जाती थी, लेकिन इनके परिवार वालों ने पाल को उच्च शिक्षा देना का निर्णय लिया था. जिसके चलते पाल अपने गांव की पहली ऐसी महिला बन गई थी, जिसने डिग्री तक की पढ़ाई पूरी कर रखी थी. पाल से पहले उनके गांव की किसी भी लड़की के पास किसी भी विषय में डिग्री नहीं थी.
  4. जब पाल के पर्वतारोही बनने की बात इनके परिवार वालों और रिश्तेदारों को पता चली थी, तो सब पाल के विरुद्ध हो गए थे. लेकिन पाल ने अपने परिवार वालों के खिलाफ जाकर अपने सपनों को सच किया. वहीं जब पाल के परिवार वालों ने पाल को इस करियर में कामयाबी पाते हुए देखा तो उन्होंने अपने बेटी का साथ देने शुरू कर दिया.
  5. पाल ने राष्ट्रीय साहसिक फाउंडेशन (एनएएफ) में बतौर एक पर्वतारोहण प्रशिक्षक के रूप में भी अपनी सेवाएं दे रखी हैं. जिस वक्त उनको एवरेस्ट के अभियान के लिए चुना गया था उस वक्त वो एनएएफ में कार्यरत थी.
  6. पाल हमारे देशी की पहली और विश्व की 5 वीं ऐसी महिला बनी थी, जिन्होंने एवरेस्ट के अभियान को कामयाबी के साथ पूरा किया था. वहीं पाल के जीवन के ऊपर स्कूली किताबों में एक पाठ भी है. जिसमें बच्चों को इनके जीवन के बारे में बताया गया है.
  7. जब पाल अपने एवरेस्ट अभियान को पूरा करके नेपाल से दिल्ली लौटीं थी, तो उस वक्त हमारे देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इनसे मुलाकात की थी. पाल से मुलाकात करने के दौरान इंदिरा गांधी जी ने पाल को कहा था कि 'हमारे देश को हजारों बछेंद्री पाल की जरुरत है'.

पाल द्वारा किए गए प्रमुख अभियान (Other notable expeditions)

  1. माउंटेनियरिंग का कोर्स करने के दौरान ही पाल को रूदुगैरा और गंगोत्री पहाड़ों पर चढ़ने का मौका भी मिला था. इन दोनों पहाड़ो की ऊंचाई 5,819 मीटर और 6,672 मीटर थी लेकिन पाल ने बेहद आसानी से इन पहाड़ों पर चढ़ाई कर ली थी.
  2. साल 1993 में पाल के नेतृत्व में भारत और नेपाल के एक दल ने सफलतापूर्वक माउंट एवरेस्ट के शिखर की चढ़ाई की थी और इस दल के सभी सात सदस्य महिलाएं ही थी. माउंट एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचने वाले इस दल ने कुल 8 विश्व रिकॉर्ड बनाए थे.
  3. साल 1994 में पाल ने एक और इतिहास रच दिया था, जब इन्होंने तीन राफ्टर के जरिए हरिद्वार में गंगा नदी से अपना सफर शुरू किया था. ये सफर इन्होंने कोलकाता तक किया था और इस 2155 किलोमीटर की यात्रा को पाल और उनकी 16 महिला साथियों ने 39 दिनों में पूरा किया था.
  4. साल 1986 में यूरोप की सबसे ऊंची चोटी मोंट ब्लैंक और साल 2008 में, अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी, माउंट किलिमंजारो पर भी पाल ने सफलतापूर्वक चढ़ाई कर रखी है.
  5. साल 1999 में पाल ने 'विजय रैली टू कारगिल' शुरू की थी और इस रैली की शुरुआत दिल्ली से मोटरबाइक के जरिए की गई थी और इस रैली का अंतिन चरण कारगिल था. इस रैली में मौजूदा सभी सदस्य महिलाएं ही थी और इस रैली का लक्ष्य कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि देना था.

पुरस्कार एवं सम्मान (Awards and Recognition) –

  1. जिस तरह से पाल ने अपने एवरेस्ट अभियान को सफलतापूर्वक पूरा किया था. उसके लिए इन्हें साल 1984 में भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन की ओर से सम्मानित किया गया था और पाल को गोल्ड मेडल दिया गया था.
  2. पाल को भारत सरकार ने सम्मानित करते हुए साल 1984 में हमारे देश के प्रतिष्ठित नागरिक अवार्ड 'पद्मश्री' दिया था. इस अवार्ड को देने के दो साल बाद यानी साल 1986 में अर्जुन अवार्ड भी इन्हें दिया गया था. ये अवार्ड भारत का प्रतिष्ठित खेल पुरस्कार है.
  3. साल 1985 में पाल को उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने भी गोल्ड पदक दिया था. गौरतलब है कि जब पाल का जन्म हुआ था तो उस वक्त उत्तराखंड राज्य इस राज्य का एक हिस्सा हुआ करता था. इसलिए इस राज्य ने भी पाल का सम्मान करने के लिए गोल्ड मेडल इन्हें दिया था. इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार ने इन्हें इनके कार्य के लिए 'यश भारती' अवार्ड भी दिया था.
  4. इन्हें वर्ष 1986 में ''कोलकाता महिला अध्ययन समूह पुरस्कार'' भी दिया जा चुका है. इस अवार्ड के अलावा पाल का नाम साल 1990 में 'गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में भी शामिल किया गया था. इन्हें 'नेशनल एडवेंचर अवार्ड' भी केंद्र सरकार द्वारा दिया जा चुका है.
  5. इन्हें वर्ष 1997 में हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, गढ़वाल द्वारा पी.एचडी की मानद उपाधि से सम्मानित किया जा चुका है. इसके अलावा मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने वर्ष 2013-14 में इन्हें 'वीरांगना लक्ष्मीबाई' राष्ट्रीय सम्मान भी दिया था.
  6. पाल को साल 2013 में कलकत्ता स्पोर्ट्स पत्रकार एसोसिएशन पुरस्कार ने भी एक अवार्ड दिया था. इसके अलावा इन्हें एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि भी दी गई है.

टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन से जुड़ी हैं पाल

अपने एवरेस्ट के अभियान को पूरा करने के बाद, पाल ने साल 1984 में टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन में कार्य करना शुरू किया था. इस एडवेंचर फाउंडेशन को उन्होंने बतौर एक प्रमुख ज्वाइन किया था और इस वक्त भी वो इस फाउंडेशन का हिस्सा हैं. इस एडवेंचर फाउंडेशन के जरिए वो लोगों के साथ अपना तजुर्बा बांटती हैं और लोगों को पर्वतारोही बनने में मदद करती हैं. वहीं इस वक्त पाल अपने भाई राजेंद्र के साथ जमशेदपुर में रहे रही हैं.

पाल के जीवन पर फिल्म बनने की आई थी खबर (Bachendri Pal movie)

साल 2015 में एक खबर सामने आई थी जिसमें कहा गया था कि पाल के जीवन पर हंसल मेहता एक फिल्म बनाने जा रहे हैं. जिसमें अभिनेत्री कंगना, पाल के किरदार निभाएंगी. हालांकि इन खबरों के सामने आने के बाद हंसल मेहता ने एक ट्वीट करके कहा था कि वो इस विषय पर एक मूवी बना रहे हैं, लेकिन ये मूवी पाल के जीवन पर आधारित नहीं होगी.

साल 1989 में लिखी अपनी आत्मकथा (Bachendri Pal's autobiography)

पाल ने अपने जीवन के सफर पर एक किताब भी लिख रखी है और अपनी किताब 'एवरेस्ट-माई जर्नी टू द टॉप' के जरिए इन्होंने लोगों को बताया है कि किस तरह से एक किसान परिवार में जन्म लेने के बाद भी इन्होंने अपने सपनों के साथ समझौत नहीं किया था. इसके अलावा इन्होंने अपने एवेरस्ट के सफर का जिक्र भी इस किताब में किया है और बताया है कि एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने के लिए इन्हें किन-किन कठिनाओं को सामना करना पड़ा था. ये किताब इन्होंने साल 1989 में लिखी थी.

पाल ने अपने जीवन में कई ऊंचाई को छुआ है और उनके कार्य से हम लोगों को भी प्रेरणा मिलती है. हम उम्मीद करते हैं कि पाल अपने इन महान कार्यों को जारी रखेंगी और हमारे देश की उन लड़कियों की मदद करेंगी जो पर्वतारोही बनने का सपना देखती हैं. ताकि हमारे देश को उनकी तरह और महान पर्वतारोही मिल सकें.

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