Suryakant Tripathi (Nirala) Biography in Hindi | सूर्यकांत त्रिपाठी (निराला) का जीवन परिचय

Suryakant Tripathi (Nirala) Biography in Hindi | सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है।

Update: 2020-12-09 11:58 GMT

Suryakant Tripathi (Nirala) Biography in Hindi | सूर्यकांत त्रिपाठी (निराला) का जीवन परिचय

  • नाम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
  • जन्म 21 फ़रवरी, 1896
  • जन्मस्थान मेदनीपुर, बंगाल
  • पिता रामसहाय त्रिपाठी
  • पत्नी मनोहरा देवी
  • व्यवसाय कवि
  • नागरिकता भारतीय

प्रसिद्ध कवी सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (Suryakant Tripathi Nirala Biography in Hindi)

Famous Poet Suryakant Tripathi Nirala: सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है। निराला आधुनिक हिंदी साहित्य के सबसे प्रसिद्ध कवी थे। वे एक कवी, उपन्यासकार, निबंधकार और कहानीकार थे। साथ ही उन्होंने बहुत से स्केच भी बनाए है। 

निराला का प्रारंभिक जीवन (Early Life Suryakant Tripathi Nirala )

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म 21 फरवरी 1886 को बंगाल के मिदनापुर उत्तरप्रदेश में वसंत पंचमी के दिन हुआ था। आपके जन्म की तिथि को लेकर अनेक मत प्रचलित हैं। निराला जी के कहानी संग्रह 'लिली' में उनकी जन्मतिथि 21 फरवरी 1899 प्रकाशित है। निराला का जीवन काफी थोडा और दुर्घटनाओ से भरा हुआ था। उनके पिता पंडित रामसहाय तिवारी उन्नाव के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। उनकी माता की मृत्यु तभी हो गयी थी जब वे छोटे थे।


शिक्षा (Suryakant Tripathi Nirala Education)

निराला की शिक्षा यहीं बंगाली माध्यम से शुरू हुई। हाईस्कूल पास करने के पश्चात् उन्होंने घर पर ही संस्कृत और अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन किया। हाईस्कूल करने के पश्चात् वे लखनऊ और उसके बाद गढकोला आ गये। प्रारम्भ से ही रामचरितमानस उन्हें बहुत प्रिय था। वे हिन्दी, बंगला, अंग्रेज़ी और संस्कृत भाषा में निपुण थे और श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द और श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर से विशेष रूप से प्रभावित थे।

मैट्रीकुलेशन कक्षा में पहुँचते-पहुँचते इनकी दार्शनिक रुचि का परिचय मिलने लगा। निराला स्वच्छन्द प्रकृति के थे और स्कूल में पढ़ने से अधिक उनकी रुचि घूमने, खेलने, तैरने और कुश्ती लड़ने इत्यादि में थी। संगीत में उनकी विशेष रुचि थी। अध्ययन में उनका विशेष मन नहीं लगता था। इस कारण उनके पिता कभी-कभी उनसे कठोर व्यवहार करते थे, जबकि उनके हृदय में अपने एकमात्र पुत्र के लिये विशेष स्नेह था। 

विवाह (Suryakant Tripathi Nirala Marriage)

निराला का विवाह युवावस्था में मनोहरा देवी से हो गया। विवाह के बाद निराला ने अपनी पत्नी मनोहरा देवी से हिंदी भाषा का ज्ञान लिया। इसके तुरंत बाद उन्होंने बंगाली की बजाए हिंदी में कविताए लिखना शुरू की। बचपन में देखे गये बुरे दिनों के बाद निराला को अब अपनी पत्नी के साथ कुछ अच्छा समय व्यतीत करने का समय मिला था। लेकिन उनके जीवन का यह आनंद भी ज्यादा समय तक नही टिक सका प्रथम विश्वयुध्द के बाद फैली महामारी में जब वे 20 साल के थे तभी उनकी पत्नी मनोहरा देवी, चाचा, भाई तथा भाभी को गँवा दिया और इसके कुछ समय बाद ही उनकी बेटी की भी मृत्यु हो गयी।

उन्होंने आर्थिक मुश्किलों का भी सामना करना पड़ रहा था। इस काल में उन्होंने बहुत से प्रकाशकों के लिए काम भी किया, उन्होंने प्रूफ-रीडर और समन्वयक के रूप में काम किया था। उनका ज्यादातर जीवन बोहेमियन परंपरा के अनुसार व्यतीत हुआ। जब वे अपने लेखो में अधिक या कम विद्रोही होने लगे तो लोग उन्हें जल्दी नही अपनाते थे।

अपने द्वारा लिखे गये लेखो के जवाब में उन्हें सिर्फ और सिर्फ उपहास ही उपहास मिले। इन सभी चीजो ने उनके जीवन के अंतिम क्षणों में उन्हें पागलपन का शिकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपने लेखो में सामाजिक शोषण और सामाजिक भेदभाव के मुद्दे को बड़े ही गंभीर रूप से व्यक्त किया है।

वर्तमान में निराला उद्यान, एक भवन, निराला प्रेक्षाग्रह और डिग्री कॉलेज, महाप्राण निराला डिग्री कॉलेज का नाम उन्ही के नाम पर रखा गया है। अलाहाबाद के दारागंज मार्केट स्क्वायर में उनके जीवन क्रम को स्थापित किया गया है। यह वही जगह है जहाँ उन्होंने अपना ज्यादातर समय व्यतीत किया है। आज भी उनका परिवार अलाहाबाद के दारागंज में रहता है। 

लेखनकार्य का आरंभ (Suryakant Tripathi Nirala Beginning of Writing) 

निराला ने 1920 के आसपास से लेखन कार्य आरंभ किया। उनकी पहली रचना 'जन्मभूमि की वंदना' से आरम्भ किया था। लंबे समय तक निराला की प्रथम रचना के रूप में प्रसिद्ध 'जूही की कली' शीर्षक कविता, जिसका रचनाकाल निराला ने स्वयं 1916 बतलाया था, वस्तुतः 1921 के आसपास लिखी गयी थी तथा 1922 में पहली बार प्रकाशित हुई थी। कविता के अतिरिक्त कथासाहित्य तथा गद्य की अन्य विधाओं में भी निराला ने प्रभूत मात्रा में लिखा है।

कार्यक्षेत्र (Suryakant Tripathi Nirala Scope of Work)

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की पहली नियुक्ति महिषादल राज्य में ही हुई। उन्होंने 1918 से 1922 तक यह नौकरी की। उसके बाद संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य की ओर प्रवृत्त हुए। निराला ने महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पन्त और जयशंकर प्रसाद के साथ मिलकर छायावाद अभियान का बीड़ा उठाया था। निराला के परिमल और अनामिका को वास्तविक छायावाद हिंदी साहित्य का नाम दिया गया है।

अपने जीवन काल में उन्हें ज्यादा पहचान नही मिली थी। उनकी कविताओ का प्रकार उस समय काफी क्रांतिकारी था, लेकिन उनके स्वभाव के चलते उनकी ज्यादातर कविताए प्रकाशित नही हो पाई। अपने छंदों से उन्होंने सामाजिक शोषण के खिलाफ आवाज भी उठाई थी।

अपने कार्यो में उन्होंने वेदांत, राष्ट्रीयता, रहस्यवाद और प्रकृति के प्यार का खासा मिश्रण किया है। उनकी रचनाओ का विषय हमेशा से ही ऐतिहासिक, धार्मिक, प्राकृतिक, सामाजिक और राजनीतिक रहा है। उन्होंने ही अपनी कविताओ में सौन्दर्य दृश्य, प्राकृतिक प्रेम और आज़ादी जैसी चीजो को शामिल किया है।

इसके बाद छायावादी युग में उन्हों कविताओ के नए रूप को उजागर किया। सरोज स्मृति नाम की उनकी कविता काफी प्रसिद्ध है, जिसमे उन्होंने अपनी बेटी के प्रति उमड़े प्यार और भावनाओ का वर्णन बड़ी खूबसूरती से किया है। आधुनिक हिंदी गद्यों में मुक्त छंदों के उपयोग करने का श्रेय भी निराला को ही जाता है।

निराला की बहुत सी कविताओ को बाद में बहुत से विद्वानों ने रूपांतरित भी किया है। रूपांतरित की गयी कविताओ में दी रिटर्न ऑफ़ सरस्वती : चार हिंदी कविताए, प्यार और युद्ध, छायावाद संकलन शामिल है। 

कृतियाँ (Suryakant Tripathi Nirala Creations)

  • अनामिका (1923)
  • परिमल (1930)
  • गीतिका (1936),
  • अनामिका (द्वितीय),
  • तुलसीदास (1939),
  • कुकुरमुत्ता (1942),
  • अणिमा (1943),
  • बेला (1946),
  • नये पत्ते (1946),
  • अर्चना (1950),
  • आराधना (1953),
  • गीत कुंज (1954)

उपन्यास (Suryakant Tripathi Nirala Novel)

  • अप्सरा (1931)
  • अलका (1933)
  • प्रभावती (1936)
  • निरुपमा (1936)
  • कुल्ली भाट (1938-39)
  • बिल्लेसुर बकरिहा (1942)
  • चोटी की पकड़ (1946)

कहानी संग्रह (Suryakant Tripathi Nirala Story Collection)

  • लिली (1934)
  • सखी (1935)
  • सुकुल की बीवी (1941)
  • चतुरी चमार (1945)
  • देवी (1948)

बालोपयोगी साहित्य (Suryakant Tripathi Nirala Child Use Literature)

  • भक्त ध्रुव (1926)
  • भक्त प्रहलाद (1926)
  • भीष्म (1926)
  • महाराणा प्रताप (1927)
  • सीखभरी कहानियाँ-ईसप की नीतिकथाएँ (1969)

मृत्यु (Suryakant Tripathi Nirala Death)

उनके जीवन का अंतिम समय इलाहाबाद में बीता और 15 अक्टूबर 1961 को अलाहाबाद में निराला की मृत्यु हो गयी। हिंदी साहित्य की दुनिया को वे वैचारिक और सौन्दर्य विभाजन में बाँट कर गये थे। लेकिन आज हमें निराला जैसे बहुत कम कवी ही हिंदी साहित्य में दिखाई देते है, जिनका सभी सम्मान करते है।

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