एलजेपी फैक्टर से जेडीयू को नुकसान, सीपीआई को हो रहा है फायदा

एलजेपी की मौजूदगी की वजह से दूसरे चरण के चुनाव में जेडीयू को अच्छा खासा नुकसान होता दिख रहा है। सीपीआई को फायदा मिल सकता है। दूसरे वामदल भी फायदे में रहेंगे।

Update: 2020-11-02 14:03 GMT

बिहार विधानसभा चुनाव में एलजेपी (LJP)के अकेले चुनाव मैदान में आने से जेडीयू को छोड़कर बाकी सभी पार्टियां खुश हैं। सबको जेडीयू के मैदान में होने का फायदा मिलने की उम्मीद दिख रही है। खुद एलजेपी का दावा है कि बीजेपी-एलजेपी चुनाव बाद सरकार बनाने जा रही है। दोनों दलों का एक-दूसरे के लिए प्यार गाहे-बगाहे दिख ही जाता है। मगर, एलजेपी जिन सीटों पर जेडीयू की हार सुनिश्चित कर रही है उनमें से कई सीटों पर महागठबंधन में शामिल पार्टियों की जीत भी सुनिश्चित होती दिख रही है। यह बात जेडीयू ही नहीं बीजेपी-एलजेपी के साझा अरमानों को भी ध्वस्त करता है। एलजेपी की मौजूदगी से लेफ्ट को भी फायदा होता दिख रहा है।

लोजपा फैक्टर के कारण तेघड़ा में जीत सकती है सीपीआई

बिहार में बेगूसराय जिले के तेघड़ा विधानसभा सीट पर जेडीयू के वीरेंद्र कुमार सिंह प्रत्याशी हैं जो बीते चुनाव में आरजेडी के टिकट पर विधायक थे। मगर, यहां सीपीआई प्रत्याशी राम रतन सिंह की दावेदारी मजबूत नज़र आ रही है। इसकी एक वजह महागठबंधन उम्मीदवार होने की वजह से आरजेडी का समर्थन है तो दूसरी वजह है एलजेपी उम्मीदवार ललन कुमार की मौजूदगी। एलजेपी तेघड़ा में बीजेपी कार्यकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। त्रिकोणात्मक मुकाबले में सीपीआई का पलड़ा भारी हो गया बताया जा रहा है।

सीपीआई की स्थिति बछवाड़ा और बखरी में भी मजबूत है जहां एलजेपी नहीं है। मगर, वहां बीजेपी के बीच फूट का फायदा सीपीआई को मिल रहा है। बछवाड़ा में सीपीआई उम्मीदवार अवधेश राय पहले भी कई बार चुनाव जीत चुके हैं।

मटिहानी में जेडीयू के मुकाबले महागठबंधन नहीं एलजेपी

मटिहानी में जेडीयू के विधायक बोगो सिंह 15 साल से जीतते आ रहे हैं। महागठबंधन की ओर से सीपीएम उम्मीदवार राजेंद्र सिंह के लिए उन्हें हराना आसमान से तारे तोड़ लाने के बराबर है। एलजेपी ने राजकुमार सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है जो कभी बिहार के बाहुबली कांग्रेस नेता कामदेव सिंह के पुत्र हैं। उनके पीछे बीजेपी और कांग्रेस दोनों के कार्यकर्ता लामबंद हैं। वामपंथी दलों में भी महागठबंधन उम्मीदवार के लिए एकजुटता नहीं है। सीपीआई के प्रभाववाले मटिहानी में सीपीएम उम्मीदवार होने से यह स्थिति बनी है। सीपीआई के कार्यकर्ता निराश हैं। मटिहानी सीपीआई का गढ़ रहा है और बेगूसराय में पार्टी के लिए जान देने वाले समर्पित कार्यकर्ता इसी इलाकें से रहे हैं। ऐसे में आश्चर्य नहीं होगा जब यहां महागठबंधन उम्मीदवार तीसरे नंबर पर दिखाई दे। मटिहानी में मुकाबला जेडीयू बनाम एलजेपी हो गया लगता है।

चेरियाबरियारपुर और साहेबपुरकमाल में एलजेपी से जेडीयू को नुकसान

चेरियाबरियारपुर में जेडीयू की कुमारी मंजू वर्मा को कमजोर कर रही हैं एलजेपी की राखी देवी। महागठबंधन के आरजेडी उम्मीदवार राजवंशी मुख्य मुकाबले में हैं। आरएलएसपी के सुदर्शन सिंह भी मैदान में हैं। मगर, एलजेपी फैक्टर ने जेडीयू उम्मीदवार की नींद हराम कर दी है। यहां भी एलजेपी को बीजेपी का अंदरखाने साथ मिल रहा है।

साहेबपुरकमाल में मुख्य मुकाबला महागठबंधन से आरजेडी के ललन यादव उर्फ सतानंद सबुद्ध और एनडीए की ओर से जेडीयू उम्मीदवार शशि कुमार शशि के बीच है। मगर, एलजेपी ने सुरेंद्र विवेक को टिकट देकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। सुरेंद्र विवेक निर्दलीय रहकर 2015 में 18 हजार वोट पा चुके हैं। ऐसे में उनकी मौजूदगी यहां वोट कटुआ न होकर गभीर और जीत सकने वाले उम्मीदवार के तौर पर है। जाहिर है नुकसान जेडीयू को हो रहा है।

एलजेपी के कारण भागलपुर, नाथनगर, गोपालपुर में महागठबंधन को फायदा

भागलपुर शहर की सीट कांग्रेस के पास है। विधायक अजीत शर्मा के पास अपनी सीट बचाने की चुनौती है। उनके लिए बाधा कांग्रेस के बागी उम्मीदवार सैयद शाह अली हैं। मगर, फायदेमंद स्थिति है कि बीजेपी उम्मीदवार रोहित पांडे को जबरदस्त गुटबाजी का सामना करना पड़ रहा है। वहीं एलजेपी ने भी यहां राजेश वर्मा को उम्मीदवार बनाकर बीजेपी की हालत पतली करने का काम किया है। फिर भी इस सीट पर कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है।

नाथनगर में भी एलजेपी की मौजूदगी से जेडीयू के लक्ष्मीकांत मंडल को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। यहां आरजेडी के अशरफ सिद्दीकी चुनाव मैदान में हैं। एलजेपी के अमर कुशवाहा चुनाव मैदान में हैं। खास बात यह है कि आरजेडी से भी बागी होकर अशोक आलोक बीएसपी के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं। जेडीयू की जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि एलजेपी उन्हें कितना कम नुकसान पहुंचा पाती है।

गोपालपुर सीट पर 15 साल से जेडीयू का कब्जा है। मगर, इस बार जेडीयू के गोपाल मंडल को जीत का चौका लगाने से रोकने के लिए एलजेपी के सुरेश भगत मैदान में जटे हैं। मुख्य मुकाबले में महागठबंधन उम्मीदवार शैलेश कुमार सिंह हैं। महागठबंधन उम्मीद कर सकती है कि वह यह सीट जेडीयू से छीन ले। वजह होगी एलजेपी

नीतीश के इलाके में भी एलजेपी ने लड़ाई बना दी है त्रिकोणात्मक

नीतीश के गृहक्षेत्र हरनौत में जेडीयू के हरिनारायण सिंह को अपनी ही पार्टी की बागी और एलजेपी उम्मीदवार मता देवी से तगड़ी चुनौती मिल रही है। महागठबंधन की ओर से कांग्रेस प्रत्याशी कुंदन गुप्ता त्रिकोण बना रहे हैं। एलजेपी इस सीट पर मुख्य मुकाबले में दिख रही है।

हिलसा में आरजेडी उम्मीदवार अत्रि मुनि उर्फ शक्ति सिंह यादव की जीत में जेडीयू का अहम योगदान था। इस बार जेडीयू उम्मीदवार कृष्ण मुरारी शरण उर्फ प्रेम मुखिया हैं। मगर, एलजेपी उम्मीदवार कुमार सुमन सिंह उर्फ रंजीत सिंह जेडीयू की लड़ाई को मुश्किल बना रहे हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं होगा कि आरजेडी एक बार फिर यहां अपना परचम लहराने में कामयाब रहे।

राजगीर में जेडीयू के उम्मीदवार हैं कौशल किशोर जिनके पिता एसएन आर्या यहां से 8 बार विधायक रहे हैं। बीजेपी से बगावत कर मंजू देवी ने एलजेपी से चुनाव मैदान में हैं। महागठबंधन ने कांग्रेस के रवि ज्योति कुमार को उम्मीदवार बनाया है। मुकाबला त्रिकोणीय है। मगर, यह बात तय है कि अगर एलजेपी ने उम्मीदवार नहीं दिया होता तो जेडीयू की बहुत आसान जीत होती।

अस्थावां में एनडीए की ओर से जेडीयू उम्मीदवार डॉ जीतेंद्र प्रसाद की मुश्किलें एलजेपी उम्मीदवार रमेश कुमार तो बढ़ा रहे हैं उनके विरोध में पार्टी के भीतर मचा घमासान अधिक कांटेभरा साबित हो रहा है। एक बागी अनिल कुमार को ही आरजेडी ने टिकट दिया है। एक अन्य बागी हैं बिपिन कुमार। फिर भी यह सीट जेडीयू के प्रभाव वाला है।

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