Dr Har Gobind Khorana Biography in Hindi | डॉ. हरगोविंद खुराना का जीवन परिचय

Dr Har Gobind Khorana Biography in Hindi | डॉ. हरगोविंद खुराना जी एक महान भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक थे, जिन्होंने DNA को डिकोड किया था। और जीन इंजीनियरिंग की नींव रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। 1968 में उन्हें प्रोटीन संश्लेषण में न्यूक्लिटाइड की भूमिका का बेहतर प्रदर्शन करने के लिए चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार भी प्रदान किया गया था।

Update: 2020-11-25 19:02 GMT

Dr Har Gobind Khorana Biography in Hindi

Dr Har Gobind Khorana Biography in Hindi | डॉ. हरगोविंद खुराना का जीवन परिचय

  • पूरा नाम डॉ. हरगोविंद खुराना
  • जन्म 9 फरवरी, 1922
  • जन्मस्थान रायपूर, मुल्तान, पंजाब
  • पिता लाला गणपतराय
  • पत्नी एस्थर
  • पुत्र सिब्लर
  • शिक्षा MSc, PhD
  • व्यवसाय वैज्ञानिक
  • पुरस्कार लुईसा ग्रॉस होरविट्ज पुरस्कार
  • नागरिकता/राष्ट्रीयता भारतीय

वैज्ञानिक डॉ. हरगोविंद खुराना (Dr Hargobind Khorana Biography in Hindi)

Dr Har Gobind Khorana Biography in Hindi | डॉ. हरगोविंद खुराना जी एक महान भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक थे, जिन्होंने DNA को डिकोड किया था। और जीन इंजीनियरिंग की नींव रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। 1968 में उन्हें प्रोटीन संश्लेषण में न्यूक्लिटाइड की भूमिका का बेहतर प्रदर्शन करने के लिए चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार भी प्रदान किया गया था।

प्रारंभिक जीवन (Dr Hargobind Khorana Early Life)

हरगोविंद खुराना का जन्म 9 जनवरी, 1922 में भारत के पंजाब के रायपुर नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता एक पटवारी थे। अपने माता-पिता के चार पुत्रों में हरगोविंद सबसे छोटे थे। जब मात्र 12 साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया, और ऐसी परिस्थिति में उनके बड़े भाई नंदलाल ने उनका पालन पोषण किया। 

शिक्षा (Dr Hargobind Khorana Education)

उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानिय स्कूल में ही हुई। उन्होंने मुल्तान के डी.ए.वी. हाई स्कूल में भी अध्यन किया। वे बचपन से ही एक प्रतिभावान विद्यार्थी थे, जिसके कारण इन्हें बराबर छात्रवृत्तियाँ मिलती रहीं उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से 1943 में BSc तथा 1945 में MSc की डिग्री प्राप्त की। 

पंजाब विश्वविद्यालय में महान सिंह उनके निरीक्षक थे। इसके बाद भारत सरकार की छात्रवृत्ति पाकर उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए। इंग्लैंड में उन्होंने लिवरपूल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रॉजर जे.एस. बियर के देख-रेख में अनुसंधान किया, और डाक्टरैट की उपाधि अर्जित की। इसके उपरान्त इन्हें एक बार फिर भारत सरकार से शोधवृत्ति मिलीं जिसके बाद वे स्विट्सरलैंड के फेडरल इंस्टिटयूट ऑव टेक्नॉलोजी में प्रोफेसर वी. प्रेलॉग के साथ अन्वेषण में प्रवृत्त हुए।

निजी जीवन (Dr Hargobind Khorana Married Life)

1952 में डॉ. खुराना ने स्विट्जरलैंड के एक संसद सदस्‍य की पुत्री एस्थर से विवाह किया था।उनकी पत्नी भी एक वैज्ञानिक थीं और अपने पति के मनोभावों को समझती थीं। खुराना दंपत्ति की तीन संताने हुईं, जूलिया एलिज़ाबेथ, एमिली और डेव रॉय।

करियर (Dr Hargobind Khorana Career) 

1946 में विज्ञान की दुनिया में तरह-तरह के शोध हो रहे थे। भारतीय नौजवानों को विज्ञान के प्रति जागरुक बनाने के लिए बहुत तेजी से प्रयास किए जा रहे थे। हरगोविंद ने लिवरपूल विश्‍वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहाँ पर उन्‍हें नोबेल पुरस्‍कार विजेता प्रो.अलेक्‍जेंडर टॉड के साथ काम करने का मौका मिला।

उन्‍होंने जैव रसायन के अन्‍तर्गत 'न्‍यूक्लिओटाइड' Nucleotide विषय में शोधकार्य किया। 1948 में उनका शोधकार्य पूरा हुआ। उसी दौरान उन्‍हें भारत सरकार से एक और छात्रवृत्ति मिली, जिससे वे आगे के अध्‍ययन के लिए स्विटजरलैण्‍ड चले गये। वहाँ पर उन्‍होंने प्रो. प्रिलॉग के साथ रहकर काम किया। 

उन्‍होंने दिल्‍ली बंगलौर सहित कई प्रयोगशालाओं में नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र दिया, लेकिन संयोग से उनको मनचाही नौकरी नहीं मिल सकी। इससे हरगोविंद थोड़ा खिन्‍न हो गये, और वापस इंग्‍लैंड चले गये। और केंब्रिज विश्वविद्यालय में लार्ड टाड के साथ कार्य किया। वे 1950 से 1952 तक कैंब्रिज में रहे। इसके बाद उन्होंने के प्रख्यात विश्वविद्यालयों में पढ़ाने दोनों का कार्य किया।

रसायन विभाग के अध्‍यक्ष (Hargobind Khorana As Chairman of Chemistry) 

1952 में उन्हें वैंकोवर, कैनाडा की कोलम्बिया विश्‍विद्यालय से बुलावा आया जिसके बाद वे वहाँ चले गये, और जैव रसायन विभाग के अध्‍यक्ष बना दिए गये। इस संस्थान में रहकर उन्‍होंने आनुवाँशिकी के क्षेत्र में शोध कार्य प्रारंभ किया। धीरे-धीरे उनके शोधपत्र अन्‍तर्राष्‍ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं और शोध जर्नलों में प्रकाशित होने लगे। इसके फलस्वरूप वे काफी चर्चित हो गये, और उन्‍हें अनेक सम्मान और पुरस्‍कार भी प्राप्‍त हुए।

1960 में उन्हें 'प्रोफेसर इंस्टीट्युट ऑफ पब्लिक सर्विस' कनाडा में स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। और उन्हें 'मर्क एवार्ड' से भी सम्मानित किया गया। इसके पश्चात डॉ. खुराना अमेरिका चले गये। वहाँ पर वे विस्‍काँसिन विश्‍वविद्यालय के एंजाइम शोध संस्‍थान के सहायक निर्देशक नियुक्‍त हुए। आगे चलकर वे संस्‍थान के महानिदेश भी बने।

पुरस्कार और सम्मान (Dr Hargobind Khorana The Awards) 

  • 1968 में चिकित्सा विज्ञानं का नोबेल पुरस्कार मिला।
  • 1958 में उन्हें कनाडा का मर्क मैडल प्रदान किया गया।
  • 1960 में कैनेडियन पब्लिक सर्विस ने उन्हें स्‍वर्ण पदक दिया।
  • 1967 में डैनी हैनमैन पुरस्‍कार मिला।
  • 1968 में लॉस्‍कर फेडरेशन पुरस्‍कार और लूसिया ग्रास हारी विट्ज पुरस्‍कार से सम्मानित किये गए।
  • 1969 में भारत सरकार ने 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया।

मृत्यु (Dr Hargobind Khorana Death) :

विज्ञान क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने वाले महान वैज्ञानिक डॉ हरगोविन्द खुराना 89 वर्ष की उम्र में 9 नवम्‍बर 2011 को अमेरिका के मैसाचुसेट्स में उनकी मृत्यु हो गई।

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