Morarji Desai Biography In Hindi | मोरारजी देसाई शास्त्री का जीवन परिचय

Morarji Desai Biography In Hindi | मोरारजी रणछोड़जी देसाई की पहचान स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक व्यक्ति की हैं जो कि 1977-79 तक भारत के प्रधानमंत्री थे.

Update: 2020-11-02 04:41 GMT

Morarji Desai Biography In Hindi | मोरारजी देसाई शास्त्री का जीवन परिचय

मोरारजी रणछोड़जी देसाई की पहचान स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक व्यक्ति की हैं जो कि 1977-79 तक भारत के प्रधानमंत्री थे. वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से संबंधित नहीं थे. वह भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के सर्वोच्च पुरुस्कारों से सम्मानित एकमात्र भारतीय हैं स्वतंत्रता संग्राम में और स्वतंत्रता के बाद भी एक राजनेता के रूप में मोरारजी देसाई का योगदान अद्वितीय है. कड़ी मेहनत, दृढ़ता और सच्चाई के लिए वो एक आदर्श हैं. देश के लोगों के कल्याण के लिए काम करने के प्रति देसाई की अडिग ईमानदारी ने उन्हें देशवासियों के बीच व्यापक प्रतिष्ठा दिलाई.

  • पूरा नाम (Full Name) मोरारजी रणछोड़जी देसाई
  • जन्म (Birth Date) 29 फरवरी 1896
  • जन्म स्थान (Birth Place) बॉम्बे प्रेसीडेंसी के भायेली,वलसाड (वर्तमान गुजरात में)
  • पेशा (Profession) राजनीतिज्ञ,समाज-सेवी और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री
  • राजनीतिक पार्टी (Political Party) कांग्रेस के विभाजन के पहले तक इंडियन नेशनल कोंग्रेस में फिर इंडियन नेशनल कांग्रेस ओ में सक्रिय रहे, और फिर जनता दल से प्रधानमंत्री भी बने
  • राष्ट्रीयता (Nationality) भारतीय
  • उम्र (Age) मृत्यु के समय 99 वर्ष
  • धर्म (Religion) हिन्दू
  • जाति (Caste) अनाविल ब्राह्मण परिवार
  • वैवाहिक स्थिति (Marital Status) विवाहित

मोरारजी देसाई का प्रारम्भिक जीवन (Morarji desai:Early life)

मोरारजी ने अपने पिता से ईमानदारी,कठिन परिश्रम और सच्चाई के पथ पर चलने की शिक्षा ली थी, उनके पिताजी शिक्षक थे. गुजरात में ही उन्होंने ग्रेज्युएशन के बाद सिविल सर्विस को जॉइन कर लिया था. 1911 में उनका विवाह गुजरबेन से हुआ था और उनके 5 बच्चे हुए.

मोरारजी देसाई के परिवार की जानकारी (Morarji desai's family information)

पिता का नाम (Father's name) रणछोड़जी देसाई

माता का नाम(Mother's name) वजियाबेन देसाई

पत्नी का नाम (Wife's name) गुजराबेन

पुत्र का नाम (Son's name) कांती देसाई

प्रपौत्र का नाम (Great grandson) मधुकेश्वर देसाई

मोरारजी का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान (Morarji's contribution in freedom struggle)

1930 में देश जब गांधीजी के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार से संघर्ष कर रहा था तब श्री देसाई का भी अंग्रेजो से विशवास उठने लगा और उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया,तात्कालिक आर्थिक परिस्थितयों को देखते हुए ये बहुत मुश्किल निर्णय था लेकिन देसाई को समझ आया की यही देश हित में हैं.

अपने अच्छे नेतृत्व कौशल और अच्छे स्वभाव के कारण वो स्वतंत्रता-सेनानियों के बीच पसंदीदा व्यक्ति और बाद में गुजरात में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक महत्वपूर्ण नेता बन गए. देसाई जी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए तीन बार जेल गए. 1931 में मोरारजी देसाई ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में शामिल होने का निर्णय लिया, इसके बाद 1937 में उन्हें गुजरात की कांग्रेस के सेकेट्री पद दिया गया.·

1934 और 1937 के जब प्रांतीय चुनाव में देसाई निर्वाचित हुए और बंबई प्रेसीडेंसी के राजस्व मंत्री और गृह मंत्री के रूप में कार्य किया. 1937 में जब पहली बार कांग्रेस ने अपना ऑफिस तत्कालीन बॉम्बे प्रांत में बनाया तब श्री बी.जी. खेर की अध्यक्षता में श्री देसाई मंत्रालय में राजस्व, कृषि, वन और सहकारिता मंत्री बने.

अक्टूबर, 1941 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गये सत्याग्रह आन्दोलन में श्री देसाई को हिरासत में लिया गया और भारत छोड़ो आंदोलन के समय अगस्त, 1942 में वो फिर से जेल गए,लेकिन 1945 में उन्हें रिहा कर दिया गया.

1946 में संपन्न हुए राज्य विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें बम्बई का गृह और राजस्व मंत्री नियुक्त किया गया, और उस कार्यकाल में उन्होंने भूमि राजस्व के क्षेत्र में दूरगामी सुधार कार्य किये. पुलिस और लोगों के मध्य की दूरी को कम करते हुए उन्होंने पुलिस प्रशासन को आम लोगों के जीवन और सम्पति की सुरक्षा के लिए अधिक संवेदनशील बनाया, इस तरह उन्होंने पुलिस प्रशासन को भी बखूबी संभाला.

मोरारजी का सरकार में उनका योगदान (Morarji contribution in Government)

  1. भारत की स्वतंत्रता से पहले, वह बॉम्बे के गृह मंत्री बने और बाद में 1952 में बॉम्बे राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में चुने गए. उस समय राज्य में भाषाई आन्दोलन चल रहा था जो कि भाषा के आधार पर अलग राज्य के निर्माण की मांग कर रहा था. देसाई की छवि एक कठोर नेता के रूप में थी, देसाई को जीवन मूल्यों के साथ सख्त अनुशासन और मूलअधिकारों को लागू करने के लिए भी जाना जाता था, इसके साथ ही वो एक कट्टरपंथी मानसिकता के लिए पहचाने जाते हैं. उनके अनुसार, जब तक गाँवों और कस्बों में रहने वाले गरीबों और वंचितों को जीवन का एक सभ्य स्तर प्राप्त नहीं होता है, तब तक समाजवाद की बात का कोई महत्व नही हैं. श्री देसाई ने प्रगतिशील विधान और कानून को किसानों और किरायेदारों की कठिनाइयों को कम करने के लिए अपनी चिंता व्यक्त की,और इस दिशा में कुछ ठोस कदम भी उठाए. इसीलिए माना जाता हैं कि उस समय देसाई सरकार प्रशासन और लोकप्रियता के मामले में देश के अन्य राज्यों से बहुत आगे थी. उन्होंने बॉम्बे में अपने प्रशासन के लिए व्यापक प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए ईमानदारी के साथ बहुत से कानून लागू किये.
  2. 1956 को मोरारजी देसाई केन्द्रीय मंत्रीमंडल में शामिल हुए और उन्हें उद्योग मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गयी. इसके 2 साल बाद 1958 को उन्होंने वित्त विभाग की जिम्मेदारी ली. ·
  3. श्री देसाई ने आर्थिक नियोजन और राजकोषीय प्रशासन के मामलों में कार्यों को आगे बढाया. रक्षा और विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए, उन्होंने बड़े राजस्व जुटाए, व्यर्थ खर्च को कम किया और प्रशासन पर सरकारी खर्च को बढाया. उन्होंने वित्तीय अनुशासन को लागू करके वित्तीय घाटे को बहुत हद तक कम किया. उन्होंने समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के असाधारण जीवन पर अंकुश लगाया. ·
  4. 1960 में देसाई के आदेश पर पुलिस महाराष्ट्र समिति द्वारा एक प्रदर्शन में फायर किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप 105 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी,इसके कारण उठे सार्वजनिक आक्रोश ने केंद्र सरकार को हिला दिया था. हालांकि ये भी माना जाता हैं कि इस घटना के कारण ही वर्तमान महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ. ·
  5. एक कट्टर गांधीवादी, देसाई सामाजिक रूप से रूढ़िवादी लेकिन व्यापार समर्थक थे, और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी नीतियों के विपरीत, मुक्त उद्यम सुधारों के पक्ष में थे लेकिन गृह मंत्री के रूप में, देसाई ने फिल्मों और नाटकीय प्रस्तुतियों में अभद्रता (जिसमें "चुंबन" दृश्य शामिल थे) को चित्रिण को गैरकानूनी घोषित किया.·
  6. देसाई ने पड़ोसी और कट्टर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारने के लिए काम किया और 1962 के युद्ध के बाद पहली बार चीन के साथ सामान्य संबंध बहाल किए. उन्होंने जिया-उल-हक के साथ संवाद स्थापित किया और चीन के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध और राजनयिक संबंध फिर से स्थापित किए·
  7. 1963 में, उन्होंने कामराज प्लान के तहत काम करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. प्रशासनिक व्यवस्था के पुनर्गठन के लिए लाल बहादुर शाष्त्री ने ये आग्रह किया मोरारजी प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष बने. वास्तव में सार्वजनिक जीवन के उनके लंबे और विविध अनुभव ने उन्हें अपने कार्य में दक्ष कर दिया था,इसलिए उनके अनुभव प्रशासनिक सुधार में काफी मदद कर सकते थे. ·
  8. उन दिनों कांग्रेस में रहते हुए देसाई के प्रधानमंत्री नेहरू और उनके सहयोगियों के साथ रिश्ते थोड़े जटिल थे. नेहरू की उम्र और स्वास्थ्य में विफलता के साथ, उन्हें प्रधानमंत्री के पद के लिए संभावित दावेदार के रूप में माना जाता था. नेहरूवादी लाल बहादुर शास्त्री द्वारा 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद नेतृत्व की प्रतियोगिता में भाग लेते हुए देसाई ने अपनी जगह बनाये रखी. ·
  9. 1966 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए इंदिरा गाँधी के सामने चुनाव लड़ा. देसाई ने 169 मत प्राप्त किए लेकिन गांधी से हार गए जिन्होंने 351 मत हासिल किए थे. शुरू में देसाई कम समय मिलने के कारण मंत्रिमंडल से बाहर रहे. लेकिन जैसे ही युवा इंदिरा गांधी की सरकार खराब फसल, मुद्रा अवमूल्यन और देश में बढ़ते असंतोष के बाद विवादों में फंस गई, देसाई का प्रभाव बढने लगा और वे 1967 में मंत्रिमंडल में वापस आ गए. उन्होंने गृह मंत्री के रूप में शक्तिशाली पद की मांग की , लेकिन उन्हें वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी के साथ उप प्रधानमंत्री की अतिरिक्त उपाधि दी गयी. हांलाकि उस समय तक देसाई और युवा प्रधानमंत्री के बीच संबंध सबसे अच्छे थे. ·
  10. 1969 की जुलाई में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मोरारजी से वित्त विभाग वापिस ले लिया,उस समय श्री देसाई ने भी स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री के सहयोगियों को विभागों के बदलने का पूर्वाभास था. देसाई इससे काफी आहत हुए और उनके स्वाभिमान को चोट पहुंची क्योंकि गांधी ने उनसे परामर्श की आवश्यकता भी नहीं समझी. ऐसी परिस्थितयों में उनके पास भारत के उप-प्रधानमंत्री पद से त्याग-पत्र देने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था.

1969 में कांग्रेस का विभाजन (Congress partition in 1969)

  1. 1969 में, इंदिरा गांधी और उनके सहयोगियों ने कांग्रेस पार्टी में एक प्रमुख विद्वान का काम किया, और कांग्रेस पार्टी के भीतर उनके वामपंथी समर्थकों ने कांग्रेस (आर) का गठन किया, बाद में कांग्रेस (आई) पार्टी बन गई. देसाई और बाकी कांग्रेस प्रतिष्ठान कांग्रेस (ओ) पार्टी बनाने के लिए जुट गए. जब कांग्रेस पार्टी का विभाजन हुआ, तो उन्होंने विपक्ष में अपनी आवाज़ सशक्त की.
  2. 1971 में उन्हें फिर से संसद के लिए चुना गया. गुजरात विधानसभा के चुनाव के लिए 1975 में उन्होंने अनिश्चितकालीन उपवास किया जिससे उस वर्ष जून में चुनाव सम्पन्न हो सके. चार विपक्षी दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने जनता दल का गठन किया और नए सदन में पूर्ण बहुमत हासिल किया. इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद श्री देसाई ने महसूस किया कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप, श्रीमती गांधी को अपना इस्तीफा सौंप देना चाहिए था. ·
  3. अनुभवी समाजवादी नेता राज नारायण द्वारा दायर याचिका में, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जून 1975 में चुनावी कार्यों और भ्रष्टाचार के लिए सरकारी मशीनरी का गलत तरीके से इस्तेमाल करने का दोषी ठहराया गया था, देसाई जय प्रकाश नारायण और राज नारायण के साथ देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए और उनके इस्तीफे की मांग की. · किसी भी प्रकार के विरोध के प्रति असहिष्णुता दिखाते हुए इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की और देसाई सहित सभी विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया.
  4. जब इंदिरा ने जनवरी 1977 में चुनाव करवाए, तो वह रायबरेली से राज नारायण से हार गईं, और कांग्रेस (ओ) सहित कई विपक्षी समूहों के साथ, लंबे समय के प्रतिद्वंद्वियों, क्षेत्रीय दलों और प्रतिद्वंद्वी विचारधाराओं के ब्लाकों के साथ मिलकर जनता पार्टी बनाई. इसने 356 सीटें जीतीं, 2/3 बहुमत के करीब, और आजादी के बाद पहली बार, सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व टूट गया. मोरारजी देसाई आखिरकार प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए जब जयप्रकाश नारायण ने उन्हें गठबंधन को एकजुट रखने के लिए सबसे अधिक संभावना वाले व्यक्ति के रूप में चुना. उस समय, वह 81 वर्ष के थे, लेकिन फिर भी बिना किसी विशेष बीमारी के स्वस्थ जीवन जी रहे थे.

प्रधानमंत्री के रूप में मोरारजी देसाई (Moraraji as a Prime Minister)

  1. आपातकाल के चलते 26 जून 1975 को मोरारजी को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी के बाद उन्हें एकांत कारवास में रखा गया जहां उन्होंने लगभ डेढ़ वर्ष बिताया,18 जनवरी 1977 को उन्हें रिहा किया गया. तब लोकसभा चुनाव करवाने की घोषणा होने ही वाली थी. इसके बाद उन्होंने देश भर में काफी प्रचार किया और छठी लोकसभा के लिए मार्च 1977 में हुए आम चुनावों में जनता पार्टी की फिर से मजबूत जीत हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मोरारजी देसाई ने लोकसभा चुनावों में सूरत निर्वाचन क्षेत्र से जीत दर्ज की, और बाद में सर्वसम्मित से वो ना केवल जनता पार्टी के नेता भी बने बल्कि 24 मार्च 1977 को उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.
  2. देसाई ने एक गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया, और शायद इस कारण ही निरंतर संघर्ष और बहुत विवाद के बाद भी वो राजनितिक सफलता के नये आयाम स्थापित करने में विफल रहे. उनकी सरकार ने आपातकाल के दौरान संविधान में किए गए कई संशोधनों को रद्द कर दिया और भविष्य की किसी भी सरकार के लिए राष्ट्रीय आपातकाल लगाना मुश्किल बना दिया.·
  3. 1974 में भारत के पहले परमाणु परीक्षण के बाद से, देसाई ने कहा "भारत के परमाणु रिएक्टरों को "परमाणु बमों के लिए उपयोग नहीं किया जाएगा". 1977 में, कार्टर प्रशासन ने भारत को अपने परमाणु रिएक्टरों के लिए भारी पानी और यूरेनियम बेचा, लेकिन परमाणु सामग्री के अमेरिकी ऑन-साइट निरीक्षण की आवश्यकता थी. देसाई ने परमाणु शस्त्रागार के लिए अमेरिकी रुख को विरोधाभासी के रूप में देखते हुए मना कर दिया.·
  4. 1979 में, राज नारायण और चरण सिंह ने देसाई को कार्यालय से इस्तीफा देने और 83 साल की उम्र में राजनीति से सेवानिवृत्त होने के लिए मजबूर किय. देसाई ने 1980 में आम जनता के लिए एक वरिष्ठ राजनीतिज्ञ के रूप में जनता पार्टी के लिए प्रचार किया लेकिन खुद चुनाव नहीं लड़ा.

सेवानिवृति के बाद का मोरारजी का जीवन और मृत्यु (Morarji's life after retirement and death)

देसाई की सेवानिवृत्ति के दौरान, परिवार को मुंबई में 'ओशनिया कॉम्प्लेक्स' में उनके अपार्टमेंट से न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ द्वारा जारी एक अदालत के आदेश से निकाला गया था. महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार ने उनकी मृत्यु तक उन्हें मुंबई में स्थाई सरकारी आवास प्रदान किया.सेवानिवृत्ति के बाद वह बंबई में रहते थे, और 99 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई. उन्हें अपने अंतिम वर्षों में उस पीढ़ी के स्वतंत्रता-सेनानी के रूप में सम्मानित किया गया.

मोरारजी से जुडी अन्य रोचक जानकारीयां (Some interesting facts about morarji) ·

  1. मोरारजी गुजरात विद्यापीठ के चांसलर भी रहे थे, अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में भी वो अक्टूबर महीने में विद्यापीठ जाते थे और वहाँ रहते थे. प्रधानमन्त्री पद पर रहते हुए भी वो खुद अपनी पोस्ट लिखा करते थे.·
  2. मोरारजी देसाई ने भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R & AW) को इंदिरा गांधी का प्रेटोरियन गार्ड बताया था और प्रधानमंत्री बनने के बाद R & AW की सभी गतिविधियों को रोकने का वादा किया था. और वात्स्व में उन्होंने बहुत सी एजेंसी को बंद कर दिया, और इसके बजट और संचालन को कम कर दिया.
  3. रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R & AW) के काउंटर-टेररिज्म डिविज़न के पूर्व प्रमुख और सुरक्षा सुरक्षा विश्लेषक बी. रमन ने खुलासा किया था कि, मोरारजी देसाई ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति ज़िया उल-हक को बताया कि उन्हें इस्लामाबाद की परमाणु योजनाओं के बारे में पता है.·
  4. सरदार पटेल ने उन्हें कैराना जिले में किसानों की बैठकें आयोजित करने के लिए नियुक्त किया था, जिसके कारण अंततः AMUL सहकारी आंदोलन की शुरुआत हुयी. अपने शासन के दौरान, उन्होंने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में हस्तक्षेप को वापस ले लिया और बाजार में उपलब्ध चीनी और तेल के कारण राशन की दुकानें सचमुच घाटे में चली गयी.·
  5. मोरारजी देसाई के बेटे कांति देसाई को भ्रष्ट होने और उनके पिता के नाम के प्रभाव का इस्तेमाल करने के लिए आलोचना की गई थी.·
  6. मोरारजी यूरिन थेरपी के विशेषज्ञ थे. 1978 में उन्होंने एक घंटे तक डान रथेर(Dan Rather) से यूरिन थेरेपी के बारे में बात की. देसाई ने कहा कि यूरिन थेरेपी देश के उन लाखों लोगों के लिए किसी चमत्कार से कम नही हैं जो मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए आर्थिक रूप से सक्षम नही हैं. उनका कहना था कि वो खुद प्रतिदिन ये थेरेपी लेते हैं. ·
  7. प्रधानमंत्री के रूप में, श्री देसाई इस बात के प्रति सजग थे कि भारत के लोगों को निर्भय होना चाहिए. उन्होंने शायद ही कभी अपने सिद्धांतों को परिस्थितियों के अधीन होने दिया, यहां तक ​​कि कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने विशवास बनाये रखा. उनके जैसा राजनेता मिलना देश के लिए सौभाग्य की बात हैं.
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