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Chakravarti Rajagopalachari Biography in Hindi | चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की जीवनी

Chakravarti Rajagopalachari Biography in Hindi | चक्रवर्ती राजगोपालाचारी एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, लेखक और वकील थे। वे अंतिम गवर्नर माउंटबेटन के बाद स्वतंत्र भारत के पहले तथा भारत के अंतिम गवर्नर जनरल थे।

Chakravarti Rajagopalachari Biography in Hindi
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Chakravarti Rajagopalachari Biography in Hindi 

Chakravarti Rajagopalachari Biography in Hindi | चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की जीवनी

  • नाम चक्रवर्ती राजगोपालचारी
  • जन्म 10 दिसंबर 1878
  • जन्मस्थान थोरपल्ली गांव, मद्रास, भारत
  • पिता चक्रवर्ती वेंकटार्यन
  • पत्नी अलामेलु मंगलम्मा
  • पुत्र नरसिम्हा, कृष्णास्वामी, रामास्वामी
  • व्यवसाय स्वतंत्रता सेनानी, गवर्नर, मुख्यमंत्री
  • पुरस्कार भारत रत्न
  • नागरिकता भारतीय

स्वतंत्र भारत के पहले तथा अंतिम गवर्नर सी. राजगोपालाचारी (Chakravarti Rajagopalachari Biography in Hindi)

Chakravarti Rajagopalachari Biography in Hindi | चक्रवर्ती राजगोपालाचारी एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, लेखक और वकील थे। वे अंतिम गवर्नर माउंटबेटन के बाद स्वतंत्र भारत के पहले तथा भारत के अंतिम गवर्नर जनरल थे। भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में एक महत्वपूर्ण नेता के साथ-साथ वो मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रमुख, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल, भारत के गृह मंत्री और मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे। उन्होंने एक राजनीतिक दल 'स्वतंत्रता पार्टी' की स्थापना भी की।

प्रारंभिक जीवन (Chakravarti Rajagopalachari Early Life)

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का जन्म 10 दिसम्बर 1978 को मद्रास प्रेसीडेंसी के सालेम जिले के थोरापल्ली गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक धार्मिक आएंगर परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम चक्रवर्ती वेंकटार्यन और माता का नाम सिंगारम्मा था। बचपन में वह शारीरिक रूप से इतने कमजोर थे कि उनके माता-पिता को ऐसा लगता था कि वो शायद ही ज्यादा समय तक जी पायेंगे।

शिक्षा (Chakravarti Rajagopalachari Education)

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रारंभिक शिक्षा थोरापल्ली में ही हुई। जब वो 5 वर्ष के थे तब उनका परिवार होसुर चला गया जहाँ उन्होंने होसुर आर. वी. गवर्नमेंट बॉयज हायर सेकेंडरी स्कूल में दाखिला लिया।

उन्होंने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा 1891 में पास की और 1894 में बैंगलोर के सेंट्रल कॉलेज से कला में स्नातक हुए। इसके बाद उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में कानून की पढाई के लिए दाखिला लिया और 1897 में इस पाठ्यक्रम को पूरा किया।

शादी (Chakravarti Rajagopalachari Marriage)

1897 में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की शादी अलामेलु मंगम्मा के साथ हुई। उनके कुल पांच संताने हुईं – तीन पुत्र और दो पुत्रियाँ। मंगम्मा 1916 में स्वर्ग सिधार गयीं जिसके बाद चक्रवर्ती राजगोपालाचारी अपने बच्चों के पालन-पोषण का भार संभाला।

राजनीतिक करियर (Chakravarti Rajagopalachari Political Career)

1900 के आस-पास उन्होंने वकालत प्रारंभ किया जो धीरे-धीरे जम गया। वकालत के दौरान प्रसिद्ध राष्ट्रवादी बाल गंगाधर तिलक से प्रभावित होकर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और सालेम नगर पालिका के सदस्य और फिर अध्यक्ष चुने गए। देश के बहुत सारे बुद्धजीवियों की तरह वह भी भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के सदस्य बन गए और धीरे-धीरे इसकी गतिविधियों और आंदोलनों में भाग लेने लगे।

1906 में उन्होंने कांग्रेस के कलकत्ता और 1907 में सूरत अधिवेसन में भाग लिया। 1917 में उन्होंने स्वाधीनता कार्यकर्ता पी. वर्दाराजुलू नायडू के पक्ष में अदालत में दलील दी। वर्दाराजुलू पर विद्रोह का मुकदमा लगाया गया था। वह एनी बेसेंट और सी. विजयराघव्चारियर जैसे नेताओं से बहुत प्रभावित थे।

उन्होंने 'गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट 1919 के तहत अग्रेज़ी सरकार के साथ किसी भी सहयोग का विरोध किया और 'इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल' के साथ-साथ राज्यों के 'विधान परिषद्' में प्रवेश का भी विरोध कर 'नो चेन्जर्स' समूह के नेता बन गए। 'नो चेन्जर्स' ने 'प्रो चेन्जर्स' को पराजित कर दिया जिसके फलस्वरूप मोतीलाल नेहरु और चितरंजन दास जैसे नेताओं ने इस्तीफा दे दिया।

जब महात्मा गांधी स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रीय हुए तब राजगोपालाचारी उनके अनुगामी बन गए। इसके बाद उन्होंने अपनी वकालत छोड़ दी और असहयोग आन्दोलन में भाग लिया। 1921 में उन्हें कांग्रेस कार्य समिति का सदस्य चुना गया और वह कांग्रेस के महामंत्री भी रहे। 1922 में कांग्रेस के अधिवेसन में उन्हें एक नयी पहचान मिली।

धीरे-धीरे राजगोपालाचारी तमिल नाडु कांग्रेस के प्रमुख नेता बन गए और बाद में तमिलनाडु कांग्रेस समिति के अध्यक्ष भी चुने गए। जब 1930 में गांधीजी ने नमक सत्याग्रह के दौरान दांडी मार्च किया तब राजगोपालाचारी ने भी नागपट्टनम के पास वेदरनयम में नमक कानून तोड़ा जिसके कारण सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया। गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया ऐक्ट 1935, के तहत उन्होंने 1937 के चुनावों में भाग लेने के लिए कांग्रेस को सहमत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

1937 के चुनाव के बाद मद्रास प्रेसीडेंसी में राजगोपालाचारी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी। द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को शामिल करने के विरोध में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्हें दिसम्बर 1940 में गिरफ्तार कर एक साल के लिए जेल भेज दिया गया। उन्होंने 1942 के 'भारत छोड़ो' आन्दोलन का विरोध किया और 'मुस्लिम लीग' के साथ संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन का विरोध वास्तव में उस समय सही नहीं होगा, जब भारत पर संभवतः हमला किया जा सकता था।

उन्होंने विभाजन के मुद्दे पर मोहम्मद अली जिन्नाह और महात्मा गांधी के बीच बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1946-47 में वो जवाहरलाल नेहरु के नेतृत्व में अंतरिम सरकार में मंत्री रहे। 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के साथ-साथ बंगाल भी दो हिस्सों में बंट गया। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को भारत के हिस्से वाले पश्चिम बंगाल का प्रथम राज्यपाल बनाया गया।

भारत के गवर्नर जनरल (Chakravarti Rajagopalachari Governor General of India)

भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल माउंटबेटन के अनुपस्थिति में राजगोपालाचारी 10 नवम्बर से 24 नवम्बर 1947 तक कार्यकारी गवर्नर जनरल रहे और फिर बाद में माउंटबेटन के जाने के बाद जून 1948 से 26 जनवरी 1950 तक गवर्नर जनरल रहे। इस प्रकार राजगोपालाचारी न केवल अंतिम बल्कि प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल भी रहे।

नेहरु सरकार में मंत्री (Chakravarti Rajagopalachari Minister in Nehru Government )

1950 में नेहरु ने राजगोपालाचारी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया जहाँ वो बिना किसी मंत्रालय के मंत्री थे। सरदार पटेल के मृत्यु के बाद उन्हें गृह मंत्री बनाया गया जिस पद पर उन्होंने 10 महीने कार्य किया। प्रधानमंत्री नेहरु के साथ बहुत सारे मुद्दों पर मतभेद होने के कारण उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया और मद्रास चले गए। इसके बाद राजगोपालाचारी लगभग 2 साल तक मद्रास के मुख्यमंत्री रहे।

स्वतंत्रता पार्टी की स्थापना (Chakravarti Rajagopalachari Establishment of Independence Party)

जनवरी 1957 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया और 1959 में मुरारी वैद्या और मीनू मसानी के साथ मिलकर एक नए राजनैतिक दल 'स्वतंत्रता पार्टी' की स्थापना की। बाद में एन. जी. रंगा, के. एम. मुंशी और फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा भी इसमें शामिल हुए। स्वतंत्रता पार्टी 1962 के लोक सभा चुनाव में 18 और 1967 के लोक सभा चुनाव में 45 सीटें जीतने में कामयाब रही और तमिलनाडु समेत कुछ और राज्यों में प्रभावशाली रही।

सन्मान (Chakravarti Rajagopalachari Honors)

राजगोपालाचारी जी के भारतीय राजनीति में बेहतरीन योगदान के चलते इन्हें 1954 में 'भारत रत्न' से नवाजा गया था, और साथ ही इनके साहित्य के लिए इन्हें 1958 में 'साहित्य अकादमी अवार्ड' से भी पुरस्कृत किया गया था।

मृत्यु (Chakravarti Rajagopalachari Death)

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी का नवम्बर 1972 में स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और 17 दिसम्बर 1972 को उन्हें मद्रास गवर्नमेंट हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनकी 25 दिसम्बर को मृत्यु हो गयी।

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