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'मनुष्य चिन्ह' का एक विश्लेष्णात्मक अध्ययन – प्रो. (डॉ.) योगेन्द्र यादव

मनुष्य चिन्ह का एक विश्लेष्णात्मक अध्ययन – प्रो. (डॉ.) योगेन्द्र यादव
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हिमांशु जोशी, हिंदी कहानी विधा का एक चर्चित नाम है. जो अपनी कहानियों में जीता हुआ यथार्थ परोसते हैं. कथ्य और कथानक को इस प्रकार धागे में पिरोते हैं कि कहानी एक सम्पूर्ण माला का रूप धारण कर लेती है. मनुष्य चिह्न उनकी एक प्रसिद्द कहानी है, जिस नाम से १९९६ में एक कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ. अमूमन जैसा होता है, कि लोग कहानी संग्रह के शीर्षक वाली कहानी को लोग सबसे पहले पढ़ते हैं, मैं भी पढ़ गया. सबसे पहले इस कहानी को मैंने १९९९ में पढ़ा था, फिर अब.

पुरुष वर्ग सदियों से स्त्रियों का शारीरिक शोषण करता रहा है . शहर हो, गाँव हो, हर जगह उसके साथ अन्याय अपने-अपने तरीके से होता है. पहले तो भारत की स्त्रियाँ और समाज यह हिम्मत ही नहीं जुटा पता था कि वह उनका मुखर होकर विरोध कर सके. दहशत के वातावरण में जी रही नारी पुरुष के बलिष्ठ बाँहों में घुटती रही, दम तोडती रही. बस आज अंतर इतना हो गया है कि वह मुखर होकर विरोध करने लगी है..

इसी कहानी संग्रह के इसी बहाने शीर्षक के अंतर्गत हिमांशु जोशी खुद स्वीकार करते हैं कि कहानी, कहानी होते हुए कहीं सच भी होती है. सचमुच में सच न होते हुए भी उसमें ऐसा सनातन सत्य निहित रहता है, जो सत्य से भी अधिक सत्य, अधिक पारदर्शी होता है.१

यह कहानी अति पिछड़े, सुदूर बसे गाँव की कहानी कहती है, बिलकुल सीधे और गवई भाषा में ही. कहानी की शुरुवात एक धमाकेदार मुहावरे से होती है पानी में आग लग गयी, यह मुहावरा एक रोमांच पैदा कर देता है. मन को जिज्ञासु बना देता है. किरपाल ने गोबिंदी के साथ शरम बात कर दी,३यह वाक्य मन को सचेत ही नहीं, सतेज भी कर देता है. गाँव के सभी लोग बिना कोई हकीकत जाने उसे कोसने लगते हैं. गोबिंदी एक बाल विधवा है,जिसके पति को कोई जंगली जानवर उठा ले गया था. उसकी ससुराल वालों ने उसे स्वीकार नहीं किया, इसलिए वह अपने मायके में रह रह. अब बीस पुरे कर अब इक्कीस की हैगोबिंदी. ब्याह के बाद एक बार ससुराल नहीं जा पायी थी, पति नाम का पशु कैसा होता हैउसे याद नहीं है. बिना भाई बहन और माँ के, इस अकेले घर में उसने इतने वर्ष बिताये४.

हर लेखक के अपने अनुभव होते हैं. समस्यायों को देखने-परखने का अपना नजरिया होता है. वही उसकी कृतियों का आधार बनता है. इस कहानी में भी ऐसी समस्यायों का आधार दिखाई पड रहा है.५

गोबिंदी का चरित्र निष्कलंक था. गत दस वर्षों में ऐसा कौन सा दिन हैं जब उसने देहरी न लीपी. गाय को गोग्रास नहीं दिया और तुलसी पर जल नहीं चढ़ाया. उसने भूल कर भी किसी की तरफ आँख उठा कर नहीं देखा.. ६

यह सब सुन कर उसका बूढ़ा, अँधा बाप, टूटे छप्पर के अधेरे कोने में, बैठा चिलम का धुआं उगल रहा है. लोग उसके मुह पर निधड़क थूकते हुए कह रहे हैंहँ, ओ परमा ! ऐसी नौहाल औलाद पैदा करने से पहले, तू डूब कर मर क्यों नहीं गया था रे ! तूने अपनी ही नहीं, सारी बिरादरी की नाक काट डाली...अब भी इसे गड्ढे में गेर कर जिन्दा जला दे. ऐसी बदचलन चुड़ैल के रहने से क्या...?

लोग इस प्रकार के मसले में इतने निरंकुश हो जाते थे. लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे यदि यह मना करती, तो किरपवा की मजाल थी, जो इसका बदन छू सकता ! जरुर कुछ न कुछ बिच्पात इसकी ओर से हुआ होगा. समाज की यह एक परम्परा बन बई है , ८ कि वह हर हाल में दोष स्त्री को ही देता है. पुरुष के दोष को वह हमेशा कमतर आंकता है.

रात को बर्फ गिरने का अंदेशा है. ठंडी हवा सनसनाती बह रही है. पर इस कड़ाके की इस सर्दी में भी लोग जाग रहे हैं. किसी तरह पञ्च जुटते हैं और पंचायत बैठती है. फिर आज कोर्ट में जैसे इज्जत की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं, ऐसे प्रश्न पूछे जाते है, जिससे पुरुषों के भी सर झुक जाते हैं, उसी तरह पड़ताल शुरू होती है. अंत में सरपंच उसे एकांत में ले जाकर पूछताछ करता है. सुबह सरपंच फैसला तैयार करता है कि बेचारी गोबिंदी के साथ किरपाल ने अन्याय किया है. उसे फांसी या काले पानी की सजा मिलनी चाहिए और मामला पुलिस को सौप देना चाहिए.

बिना बनावट के भी सीधे-साधे कहानी कही जा सकती है. कहानी का हर शब्द, हर सार्थक शब्द, एक-एक चित्र का पर्याय बन जाता है. किसी कहानी की यह चरम परिणिति कही जा सकती है. जिसे पढ़ते समय, पढने की ही नहीं, देखने की सी भी अनुभूति होती है. ऐसी ही अनुभूति इस कहानी को पढने के बाद भी होती है.१०

तीसरे दिन अनेक इल्जाम लगते हुए, एकांत में बयां लेने के और नक्शा तैयार करने के लिये गोबिंदी को साथ लेकर जानवरों के रीते बाड़े में जाता है.कागज पत्तर भी साथ ले जाना नहीं भूलता है. अंधियारे में गोबिंदी बच-बच कर संभल-संभल कर पटवारी के पीछे-पीछे चलती है. पटवारी के हाथ लालटेन है. वह बड़े गंभीर भाव से चल रहा है. ...जब साला यहाँ आया होगा, तुम कहाँ पर खड़ी थी ? एकांत घुप्प अधियारे बाड़े में पटवारी की आवाज गूंजी. वह ठिठका, उसके दो कदम पीछे गोबिंदी भी...

चारो ओर देखता है पटवारीकहीं कोई मनुष्य दृष्टिगोचर नहीं होता. वह उसे बाड़े के भीतर पयाल की ढेरी के पास ले जाता है

हाँ, तो तुम कहाँ खड़ी थी?

गोबिंदी चुपचाप खड़ी रहती है.

तो उसने फिर तुम्हें किस तरह पकड़ा?

पटवारी ने लालटेन धीमी कर एक ओर रख दी.

वह इस तरह से, इस छोटे वाले दरबे से कूदा होगा न ? पटवारी दरबे से बिल्ले की तरह दरबे से कूदता है.

फिर उसने झप्प से, पीछे से इस तरह पकड़ा होगा न ?

वह उसी तरह से गोबिंदी को झप्प से पकड़ता है.

फिर प्याल की ढेरी पर तुम्हें पटक कर लिटा दिया होगा न ?

पटवारी उसी तरह उसे पयाल की ढेरी पर पटक कर लिटा देता है.

तुझसे विवश होकर कुछ न बन पड़ा होगा न ? तू मुह भीच कर चुप पड़ी होगी न ?

गोबिंदी से चाह कर भी कुछ विरोध नहीं हो पता है. वह मुह भीचे चुप पड़ी रहती है.

कुछ समय बाद पटवारी अपने कपडे की घास झाड़ता हुआ उठता है.

चलो मुआयना आज हो गया११.

अंत में पता चलता है कि वह तो निर्दोष थी.१२

गांवों में इस तरह की जब कोई घटना हो जाती थी तो सरपंच इस तरह से उसकी फिर से आबरू लुटता था. वह बेचारी विवश होकर यह सब सहती थी.गाँव के भोले-भाले लोगों में यह अधिकारी इतना भय पैदा कर देते थे कि कोई उनके खिलाफ कौन कहे, किसी के सामने मुह नहीं खोल पाते थे. यह हैवानियत सरपंच तक ही सीमित नहीं रहती थी. अपितु अन्य अधिकारियों द्वारा भी वह इसी तरह नोची-खसोटी जाती थी. जो भी अधिकारी जांच के बहाने आता, पहले गाँव वालों पर जुल्म ढाता, बेतहाशा पीटता, बेमतलब की गलियां देता और फिर वही करता, जिस उद्देश्य से आया होता. बाप-दादा के उम्र के अधिकारियों को भी यह घिनौना काम करते शरम नहीं आती थी. इस कहानी में भी गोबिंदी के साथ ऐसा ही होता है -

पेशकार उस गोठ का मुआयना खुद करता हैजहाँ पर कहते हैं, किरपाल में शरम बात की थी. गोबिंदी बाल-विधवा ह . असहाय है. अनाथ है. उसके प्रति बूढ़े पेशकार के मन में स्वाभाविक करुणा उपजती है..

पटवारी नौहाल ने तुम्हारे साथ क्या-क्या किया मुला ?

गोबिंदी सहमी सी, कुछ कह पाती, तो वह उसके और पास आ जाता है. उसके सूखे बालों को सहलाते हुए पूछता है, बता न बिटियाउस कमीने ने कौन सी हरकत की थी ? कब ? किस तरह से ?

गोबिंदी चुप रहती है. इतनी आत्मीयता का बोध सह नहीं पाती दुधमुही बच्ची सी अपने घुटनों में अपना मुह छुपा कर चुपचाप रो देती है.

पेशकार का बूढ़ा ह्रदय पिघल जाता है. उसे और पास खीच कर,

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