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इज्जत..........भोजपुरी कहानी : प्रीतम पाण्डेय

इज्जत..........भोजपुरी कहानी  : प्रीतम पाण्डेय
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मंगला जो रमई मिसीर की मेहरारू थी , सात बरिस पहले बियाह करके आई थी । खूब धूमधाम से बियाह किये थे अपने बड़का बेटा का दत्तू मिसिर । गाँव के लोगों ने जिस भोजन का नाम तक नहीं जाना था वो भोजन उन्हें दत्तू मिसिर के यहाँ खाने को मिला । मंगला जब बियाह करके आई थी तब सारे लोग उसके काम-काज और व्यवहार से एकदम खुश रहते थें । थोड़े दिनों में मंगला सबकी चहेती बन गई और सबका बढिया से खयाल रखती थी । दो बरस के बाद उसने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया जिसका नाम स्वरा रखा गया । तीन पुस्तों के बाद इस घर में किसी कन्या नें जन्म लिया था जिससे उसके मान-दुलार में कोई कमी नही होती । स्वरा बिछावन से ज्यादा लोगों के गोद में अपना समय बीताती और अपने छोटे होठों से ना जाने कैसे सुख का अनुभव करती कि वो मुस्कुरा उठती । दिन सबके खुशी-खुशी बीत रहे थें ।
मंगला के बियाह के तीन साल बाद दत्तू मिसीर ने अपने छोटे बेटे का बियाह ठाना और बड़े बेटे से कम खर्चे में ही बियाह निपटा लिए । छोटी बहू के आने की खुशी भी सबको वैसी ही हुई जैसे मंगला के आने पर हुई थी लेकिन मंगला के चेहरे पर ना जाने कैसा तनाव झलक रहा था । वो इस बियाह में बात-बात पर खिसीया जाती और कोई कुछ जल्दबाजी में पूछता तो उसे खरी-खोटी सुना देती । लोगों को लगता कि अकेली सारी जिम्मेदारी सँभालने के कारण वो तनाव में रह रही है । खैर नई बहू ने गृह-प्रवेश किया और अपना दायित्व शीघ्र ही सँभाल लिया जबकि मंगला जब आई थी तो सवा महीने खाना नही बनाई थी लेकिन छोटकी आने के दिन ही दाल-पूड़ी और खीर बनाकर सबको खिलाई । दोनों बहुओं के रूप को देखकर दत्तू मिसीर और मिसराईन दोनों मन ही मन प्रसन्न हो जातें लेकिन इस घर को भी नजर लगना था सो लग ही गया ।
गाँव में एक कनिया चाची रहती थीं । कहने को भले वो कनिया थी लेकिन गाँव की खबरें घुम-घुम कर बटोरना उनका बिना तनख्वाह के रोज का पेशा था । वो दिन भर के बीच में एक पहर खाना खाती और बाकी समय लोगों का बात इधर-उधर करके अपना पेट भरती । किसी घर से उनका बिगाड़ नही था क्योंकि हर घर की मेहरारू उनको उनके स्वभाव के कारण पूजती । गाँव में किसके घर कितना नमक आज डाला गया इस बात का पता गाँव की हर मेहरारू को होता । इधर दोनों बहुओं के आने के बाद धीरे-धीरे मंगला के पास कनिया चाची का उठना-बैठना शुरू हो चुका था । दोनों के बीच जमकर बाते होतीं और अब कनिया चाची मंगला के पूछने पर भोजन भी यहीं कर लेतीं । कुछ दिनों तक सबकुछ ठीक चलता रहा लेकिन अब मंगला का स्वभाव बदलने लगा था । वो अब चुल्हा-चौकी के काम से तौबा करने लगी थी । धीरे-धीरे उसने सारे कामों से अपना पीछा छुड़ाना शूरू कर दिया था । घर के सभी सदस्यों को यह समझ आ गया था , इसमें जरूर कनिया चाची का हाथ है लेकिन फिर भी वो चुप रहते थें । मिसराईन समझदार थीं और उन्होनें रमई से इस बारे में बात करना उचित समझा । वो रमई से जाके बोलीं कि मंगला को कुछ दिनों के लिए मायके से घुमा लाओ । रमई समझ गया कि बात कुछ और है , बिना बात के माँ मंगला को ले जाने के लिए नही कहेंगी लेकिन उसने बिना कोई सवाल किए मंगला को मायके जाने के लिए तैयार होने को कहा । मंगला झूम उठी और चलने को तैयार होने गई । दोनों स्वरा को साथ लेकर चले गए । उनके जाने के बाद घर में फिर सबकुछ ठीक चलने लगा लेकिन उनके जाने के बाद छोटी बहु ने सास से मंगला और कनिया चाची के बीच हुई कुछ बातों को बताया । इधर कनिया चाची ने आना-जाना भी कम कर दिया था तो मिसराईन को इस बात में सच्चाई भी लगने लगी थी लेकिन फिर भी उन्होनें छोटी बहु को मना किया कि ये बात किसी और से ना कहे ।
थोड़े दिनों बाद मंगला मायके से एक नए अवतार में लौटी । आते ही उसने रमई को अलग हो जाने के लिए कहा । रमई ने अलग होने की बात से साफ इन्कार कर दिया तो उसने जान देने की धमकी दे डाली । रमई भीतर तक हिल गया और उसने इस बारे में मिसराईन से बात करना चाहा लेकिन हिम्मत नही हुई । इधर मंगला भी रोज उसे ताने देती और अलग होने की बात को लेकर लड़ते रहती । आजिज होकर रमई ने एक दिन कह डाला कि जो करना है करो , मैं अलग नही होऊँगा । इतना सुनकर जल-भून गई मंगला और सामान तुरंत समेटकर उसी रात अपने मायके चली गई । सवेरे जब घरवालों को पता चला तो सब परेशान हो उठें । दत्तू मिसीर ने रमई को मंगला को ले आने के लिए कहा लेकिन वो तैयार नही हुआ । अगले दिन उनके द्वार पर एक पत्र आया जिसमें धमकी भरे शब्द थें । मंगला ने वो पत्र भेजा था जिसमें लिखा था कि यदि रमई मेरी बात मानते हैं तो मैं आऊँगी अन्यथा वो तलाक ले लें । रमई और घरवालों पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा लेकिन सब मजबूती से खड़े रहे । उन्होनें उसी संदेशवाहक से अलग ना होने की बात लिखवा भेजा । ठीक उसके दो दिन के बाद द्वार पर पुलिस आई और दत्तू मिसीर को छोड़ सबको उठा ले गई । मंगला ने सभी के उपर दहेज उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करवाई थी जो सबके परेशानी का कारण बनी । पुलिस वालों को समझाते रहें दत्तू मिसीर लेकिन उन्होनें कचहरी के सहारा लेने का सलाह दिया और सबको लेकर चले गए । दत्तू मिसीर ने अदालत का सहारा लिया , केस चला और मंगला हार गई । केस की बुनियाद ही कमजोर थी , उसने छोटी बहु पर भी दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था जो कि निराधार था । जिस औरत को आए सात साल हो गए थे उसपर दहेज उत्पीड़न कैसा ? जो उसके बाद आई उससे किसी प्रकार की कोई माँग नही हुई और वो खुश है तब बड़ी वाली से दहेज की माँग कैसे हो सकती है ? अदालत ने अपना निर्णय सुनाया और ये सभी जल्द ही रिहा हो गए लेकिन इन सबों को अपनी इज्जत प्यारी थी और सीधे-सादे परिवार के सदस्य थाना और अदालत के चक्कर में कभी नही पड़े थें लेकिन उनके साथ ऐसा हुआ ।
जिस दिन वो रिहा हुए उस दिन सभी खुश थें और इसी खुशी को यादगार बनाने के लिए अपने स्तर से उन्होनें खीर-पुड़ी बनाई जो वो हर छोटे उत्सवों पर बनातें थें । खाने का जब समय हुआ तब मिसराईन ने सबको बैठने के लिए कहा और अपने परोसने लगी । बहु ने हाथ बँटाना चाहा लेकिन उसे भी मना कर दी । सबको परोसने के बाद अपना खाना भी ले आई और सभी ने खाना शुरू किया । सबों ने जमकर खाया लेकिन ये खुशी शायद उनके जिन्दगी की आखिरी खुशी थी । खाना खाने के थोड़ी देर बाद ही सबको जबरदस्त बेचैनी शुरू होने लगी लेकिन ये बेचैनी भी जल्दी समाप्त हो गई । सबों ने अपनी प्राण की बलि देकर समाज के ताने सुनने से अपने को बचा लिया । जिस मिसराईन के उदारता की मिसालें दी जाती , आज वो इतनी कठोर निकली कि सबको एकसाथ ले गई । उन्हें अलग होकर जीना पसंद नही था और इसी कारण उन्होनें एकसाथ मरना पसंद किया ।

प्रीतम पाण्डेय सांकृत
छपरा , बिहार से ।
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