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चंपारण सत्याग्रह शताब्दी, अद्भुत था वह सत्याग्रह

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी, अद्भुत था वह सत्याग्रह
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लखनऊ: चम्पारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे हो चुके हैं। आज उसकी चर्चा चली है तो बड़े-बुजुर्गों से जानी-सुनी पुरानी बातें याद आ जाती हैं। हमलोग चंपारण जिले के पुश्तैनी बाशिंदा हैं। मेरे परबाबा बाबू गोपालजी सहाय उन दिनों मोतिहारी में 'प्लेंटर्स एसोसिएशन' के मुकामी मुख्तार थे। सत्याग्रह के दौरान नीलहा साहबों से नाता तोड़ वह गांधीजी की सहायक-मंडली के साथ हो लिए। जिले में गोरे नीलहा साहबों की सैकड़ों कोठियां थीं। वे छोटे किसानों को पट्टे पर जमीन देते और प्रति बीघा तीन कट्ठे में जबरन नील की खेती करवाते। खेती का सारा खर्च बेचारे जोतदारों के मत्थे चढ़ता। उस प्रथा को 'तीनकठिया' कहा जाता था।

तीनकठिया का फंदा बड़ा दुखदायी था। रैयतों को न केवल जमीन की मालगुजारी, बल्कि फसल पर भी कर देना पड़ता। खेतों में मजदूरों को या तो मुफ्त खटवाया जाता या 10 पैसे थमा दिए जाते। गोरों का दबदबा इतना था कि इलाके के जागीरदारों तक की मजाल न थी कि नीलहों के खिलाफ जुबान खोलें। रैयतों की झोपड़ी जला देना, औरत-मर्दों की धुनाई, बेदखली आदि अत्याचार आए दिन होते ही रहते।

ऐसे हालातों में ही राजकुमार शुक्ल किसानों की दुर्दशा मिटाने गांधीजी को चंपारण लाए थे। उन दिनों भारत में गांधी को कम ही लोग जानते थे। राजकुमार शुक्ल चंपारण के मामूली किसान थे। उनके साथ गांधीजी निकल तो पड़े लेकिन पटना पहुंचते ही उन्हें लगने लगा कि काम कठिन है, ऐसे में उन्होंने कमान खुद संभालना तय किया। लंदन में पढ़ाई के दिनों में मौलाना मजहरूल हक उनके सहपाठी थे।

अब वह पटना में बैरिस्टरी करते थे। खबर मिली तो गांधीजी को वह अपने घर ले आए। उनकी बात सुनी और इस दिशा में सावधानी बरतने की सलाह दी। उन्होंने गांधीजी के मुजफ्फरपुर जाने का इंतजाम कर दिया। मुजफ्फरपुर के जीबी कॉलेज में आचार्य कृपलानी प्रोफेसर थे। गांधीजी का उनसे परिचय था। गांधीजी उनके साथ ठहरे और उन्हीं कीपहल पर कुछ स्थानीय वकीलों से विचार-विमर्श किया। सभी को लगा कि मामला कानूनी बन जाएगा और लम्बा खिचेगा। चूंकि चंपारण का मुख्यालय मोतिहारी है, इसलिए केंद्र वहीं बनाना पड़ेगा।

मोतिहारी रवाना होने से पहले गांधीजी तीन दिनों तक मुजफ्फरपुर रुके थे। वहां नीलहा साहबों का संगठन 'प्लांटर्स एसोसिएशन' के सेक्रेटरी ने बड़ी नाराजगी में उनसे पूछा था कि कोठी की जायदाद-काश्तकारी वगैरह के मामले में उन जैसा कोई बाहरी शख्स क्यों दखल देगा? तिरहुत के कमिश्नर ने भी उन्हें तुरंत वापस जाने की हिदायत दी लेकिन पांव पीछे खींचना गांधी की फितरत में न था।

वह 15 अप्रैल, 1917 को मोतिहारी पहुंचे। अगली सुबह पड़ताल के सिलसिले में केसरिया थाने के जसौलीपट्टी जाते समय दरोगा ने उन तक जिले के एसपी का सलाम पहुंचा दिया, जिसका प्रशासनिक अर्थ था कि उन्हें फौरन तलब किया गया है। धरणीधर बाबू और रामनवमी बाबू को गंतव्य की ओर भेज गांधीजी लौट आए। वहां पर वह नोटिस तामील हुई, जिसके मुताबिक उन्हें फौरन चंपारण छोड़ देने का हुक्म था। पावती रसीद पर गांधीजी ने दर्ज कर दिया कि जांच जब तक पूरी नहीं हो जाती, चंपारण छोडऩे का उनका बिल्कुल इरादा नहीं। लिहाजा, उन पर मुकदमा चला।

18 अप्रैल, 1917 को कोर्ट में पेशी हुई। मजिस्ट्रेट ने पूछा, क्या आपका कोई वकील है?' गांधीजी ने कहा, नहीं, अपना पक्ष मैं खुद रखूंगा।' उन्होंने अंग्रेजी में लिखा बयान पढऩा शुरू किया, मैंने सरकारी आदेश का उल्लंघन इसलिए नहीं किया कि मेरे मन में सरकार के प्रति अनादर के भाव हैं, बल्कि इसलिए कि अंतरात्मा की उच्चतर आज्ञा का पालन मैंने अधिक उचित समझा है।

मैं यहां उन रैयतों के आग्रह पर आया हूं जिनकी शिकायत है कि नीलहा साहब लोग उनके साथ न्यायोचित व्यवहार नहीं करते। मैं उनकी कोई सहायता कैसे कर सकता था, जब तक वस्तुस्थिति की सच्चाई स्वयं देख-समझ न लूं? मैं स्वेच्छापूर्वक यह इलाका तब तक नहीं छोड़ सकता, जब तक काम पूरा न हो जाए। अत: अपने निष्कासन का भार अपनी ओर से मैं भी प्रशासन को ही सौंपता हूं। मैंने कानून की अवज्ञा अवश्य की है, परन्तु बिना किसी विरोध के उसका दंड भुगतने को भी तैयार हूं।'

किसी मुकदमे में ऐसा सच्चा, निडर और कृतसंकल्प बयान शायद ही कभी सुना गया हो। कोर्ट में सन्नाटा पसर गया। मजिस्ट्रेट चकरा गए। वे समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसे केस में क्या फैसला दिया जाए, जिसमें अभियुक्त खुद ही आरोप स्वीकार कर दंड तो मांग रहा हो, किंतु अपने उद्देश्य और अभियान के प्रति अडिग खड़ा हो। तब तो यही देखना बाकी रहा कि मढ़े गए दोष और व्यवहार क्या कानून की दृष्टि में दंडनीय अपराध हैं?

ऊहापोह की स्थिति में फैसले की तारीख बढ़ा दी गई। इस बीच गांधीजी ने वायसराय, सूबे के गवर्नर, मालवीयजी, दीनबंधु ऐंड्र्यूज़, मिस्टर पोलक तथा मजहरूल हक समेत कई गणमान्य लोगों को तार से सूचना दे दी। सत्याग्रह को वह राजनीतिक स्वरूप देना नहीं चाहते थे।

फिर भी 'स्टेट्समैन' जैसे अखबारों के कारण मामला तूल पकडऩे लगा। ब्रिटिश सरकार चिंतित थी कि एक तरफ प्रथम विश्वयुद्ध का घमासान छिड़ा था, तो दूसरी ओर रूस में लेनिन की बोलशेविक क्रांति निर्णायक मुकाम पर जा पहुंची थी। ऐसे नाजुक दौर में किसी सरकार के लिए बल प्रयोग की अपेक्षा बुद्धिमत्ता की अधिक आवश्यकता थी। सो, स्थानीय प्रशासन को गवर्नर का आदेश मिला की गांधी के खिलाफ मुकदमा तुरंत उठा लिया जाए और उनके कार्य में आवश्यक प्रशासनिक सहयोग भी दिए जाएं।

नतीजतन, पड़ताल में तेजी आ गई। मोतिहारी के बंजरिया पंडाल स्थित सत्याग्रह कार्यालय में बयान दर्ज करवाने वाले रैयतों का हुजूम उमडऩे लगा। 5000 से अधिक रैयतों के बयान दर्ज हुए। कुछ ही महीने बाद प्रांतीय सरकार ने भी जांच समिति गठित कर दी, जिसमें गांधीजी भी मनोनीत किए गए थे। उस समिति की अनुशंसा पर लगभग 100 साल पुरानी तिनकठिया प्रथा कानूनी तौर पर सदा के लिए समाप्त कर दी गई।

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