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भाषा की मर्यादा से दूर दम तोडती राजनितिक शालीनता।

मध्यप्रदेश के छतरपुर की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से "मां" और "मामा" को भूनाया इस बात ने मुझ़े भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक स्व. डॉ. जे.के. जैन की याद दिला दी। वक्त था 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव का। मैं जैन टी.वी. में एंकर के तौर पर कार्यरत था। डॉक्टर जैन ने मुझ़े फोन कर अपने घर बुलाया। तकरीबन दोपहर 3 बजे मैं डॉक्टर जैन के घर पहुंचा, हमेशा की तरह अपने सरल स्वभाव से डॉ. जैन ने मुझ़े ज़बरदस्ती खाने पर अपने साथ बैठने को कहा। खाना खाते वक्त गुजरात चुनाव को लेकर चर्चा हुई। खाने के बाद डॉक्टर जैन ने मुझ़े गुजरात चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी के लिए कुछ चुनाव प्रचार के लिए सामग्री और बैनर के लिए स्लोगन लिखने को कहा। यह नारे और स्लोगन लेकर डॉ. जैन को कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से मिलने जाना था। उस वक्त डॉ. जैन भाजपा का दामन छोडकर कांग्रेस का पंजा थाम चुके थे। बहरहाल डॉ. जैन के साथ जब गुजरात विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए बैनर और स्लोगन तैयार करने बैठा तो उस वक्त यानि आज से 11 साल पहले साल 2007 में डॉ.
जैन ने मुझ़े वहीं स्लोगन गुजराती में लिखने के लिए कहा था जिसका इस्तेमाल 2018 के मौजूदा मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी की नैया पार लगाने के लिए कर रहे हैं। जी हां कांग्रेस का दामन थामने के बाद डॉ. जैन ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव प्रचार के लिए "मामा" शब्द का इस्तेमाल करने का मन बनाया था। डॉ. जैन के कहने पर मैने "मोदी मामा" के नाम पर कई सारे चुनावी नारे बनाकर दिए। लेकिन खास बात यह है कि जब डॉ. जैन ने यह नारे कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को बताए तो सोनिया गांधी ने "मामा" नारे को मुस्तरद करते हुए कहा कि पारिवारिक शब्दों को चुनावी प्रचार में लाना सही नहीं है। उस वक्त का यह घटनाक्रम मैं आज इस लिए याद कर रहा हूं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ से आज इस्तेमाल किए जानेवाला नारा डॉ.
जैन के ज़हन में 11 साल पहले ही उभर आया था और दूसरी बात यह कि उस वक्त कांग्रेस अध्यक्षा ने शालिनता से राजनीति करने की मिसाल देते हुए इन नारों से परहेज़ करने की बात कही थी लेकिन आज के दौर में लगता है कि चुनाव जीतने के लिए शालीनता कोई मायने नहीं रखती। शायद इसिलीए 2012 के बाद के सभी चुनाव "मां" "मामा" और "जीजा" जैसे नारों पर लडे जा रहे हैं। जबकि जनता से जुडे मुद्दे सतह से कोसों दूर नज़र आ रहे हैं।
सहल क़ुरेशीवरिष्ठ पत्रकार, अहमदाबाद
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