अब देश में ब्लैक फंगस का प्रकोप, इन 13 राज्यों में जानलेवा बीमारी ने दी दस्तक, जानें इसके बारे में सबकुछ

अब देश में ब्लैक फंगस यानी म्यूकोरमाइकोसिस नाम की जानलेवा बीमारी ने संकट बढ़ा दिया है। ब्लैक फंगस स्वस्थ हो चुके कोरोना संक्रमितों की आंखों की रोशनी छीन रहा है।

Update: 2021-05-14 15:06 GMT

अब देश में ब्लैक फंगस यानी म्यूकोरमाइकोसिस नाम की जानलेवा बीमारी ने संकट बढ़ा दिया है। ब्लैक फंगस स्वस्थ हो चुके कोरोना संक्रमितों की आंखों की रोशनी छीन रहा है। यह इतनी गंभीर बीमारी है कि मरीजों को सीधा आईसीयू में भर्ती करना पड़ रहा है। अब ब्लैक फंगस के सबसे अधिक मामले गुजरात में सामने आए हैं। इसके अलावा ब्लैक फंगस ने छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, दिल्ली, मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, यूपी, बिहार और हरियाणा में मुसीबत बढ़ा दी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक साइनस की परेशानी, नाक का बंद हो जाना, दांतों का अचानक टूटना, आधा चेहरा सुन्न पड़ जाना, नाक से काले रंग का पानी निकलना या खून बहना, आंखों में सूजन, धुंधलापन, सीने में दर्द उठना, सांस लेने में समस्या होना एवं बुखार होना म्यूकरमाइकोसिस के लक्षण हैं। चिकित्सकों के अनुसार, यह सबसे ज्यादा उन कोविड-19 मरीजों में मिल रहा है जिन्हें मधुमेह है।

हमेशा वातावरण में रहता है ब्लैक फंगस

कोरोना के इलाज के दौरान धड़ल्‍ले से स्‍टेरॉयड का इस्‍तेमाल बड़ी वजह बन रहा है। यह कोरोना की तरह अचानक आया कोई नया फंगस नहीं है मगर कोरोना में जब लोगों की रोग निरोधक क्षमता घट गई है इसने अचानक उग्र रूप ले लिया है। ईएनटी के सर्जन डॉ अभिषेक रामाधीन बताते हैं कि साल में दो-तीन मामले आते थे, चार दिनों में बीस मामले आये। उन्‍होंने सात-आठ लोगों का ऑपरेशन किया है। उन्‍होंने कहा कि ब्‍लैक फंगस हमेशा वातावरण में रहते हैं। जहां अंतिम संस्‍कार होता है, गन्‍ने की खेती होती है वहां ये प्रचुर मात्रा में रहते हैं। मगर शरीर में रोग निरोधक क्षमता बहुत कम होने पर ये हमला करते हैं। अनियंत्रित शुगर, कैंसर के मरीजों को यह निशाना बनाता है।

स्टेरॉयड बन रही वजह

कोरोना में शरीर की रोग निरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती है, ऐसे में धड़ल्‍ले से एस्‍टेरॉयड का इस्‍तेमाल हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में क्‍वैक्‍स सिर्फ बुखार देखकर डेक्‍सामेथासोन दस-दस दिन चला रहे हैं। यह स्‍टेरॉयड है। एस्‍टेरॉयड से शरीर की रोग निरोधक क्षमता कम होती है और अनियंत्रित शुगर हो जाता है। जो शुगर के मरीज नहीं होते हैं उनमें भी अनियंत्रित शुगर की शिकायत हो जाती है। इस तरह यह दोधारी तलवार की तरह काम करता है। तुरंत इलाज नहीं होने पर ब्‍लैक फंगस के मामले में पचास प्रतिशत लोगों की मौत हो जाती है।

एचईसी (भारी अभियंत्रण निगम, रांची) के पूर्व चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ केके कदम ने आउटलुक से कहा कि यह नया फंगस नहीं है मगर पहले इसके मरीज नहीं आते थे। इधर तेजी से आने लगे हैं। गन्‍ना के खेतों में इसका फंगस बहुत पाया जाता है। कैंसर, शुगर, बीपी के मरीज जिनकी रोग निरोधक क्षमता कम होती है, ब्‍लैक फंगस हावी हो जाता है। कोरोना संक्रमण के दौरान लोगों की रोग निरोधक क्षमता कम हुई है स्‍टेरॉयड एम्‍युनिटी को और कम कर देता है, शुगर बढ़ा देता है बस ब्‍लैक फंगस को मौका मिल जाता है। स्‍टेरॉयड का बहुत सोच कर इस्‍तेमाल होना चाहिए, इधर देख रहा हूं डॉक्‍टर पर्चे पर तुरंत स्‍टेरॉयड लिख देते हैं। ईएनटी रोग विशेष डॉ हर्षवर्धन के अनुसार ब्‍लैक फंगस आज नहीं 1885 की बीमारी है, जर्मनी में पहली बार इसकी पहचान हुई थी। भारत में शुगर के काफी मरीज हैं और करोरोना में स्‍टेरॉयड का इस्‍तेमाल हो रहा है इस कारण भी ब्‍लैक फंगस का प्रकोप अचानक बढ़ा है।

ऑक्सीजन सिलिंडर का सही उपयोग जरूरी

वहीं कृत्रिम ऑक्सीजन सिलिंडर हजारों रूपए में बाजार में बेचे जा रहे हैं। अस्पताल के बदतर हो चले हालात को लेकर लोग अपने पीड़ितों का घर पर भी इलाज और ऑक्सीजन सपोर्ट दे रहे हैं। मरीज होम आइसोलेशन में रह रहे हैं और वो ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं। लेकिन, डॉक्टरों का कहना है कि ऑक्सीजन सिलिंडर को कैसे लगाना और ऑपरेट करना है। इसकी जानकारी ना हो तो मरीज की जान भी जा सकती है। ये आम चीजें नहीं है, जिसे कोई भी कर सकता हो। हां, पूरी जानकारी होने के बाद इसे लगाया जा सकता है। यदि मरीज का सांस फुल रहा है तब निमोनिया के लक्षण हो सकते हैं।

आउटलुक से बातचीत में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) लखनऊ के पलमोनरी और क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर वेद प्रकाश कहते हैं कि लोगों को बिना जाने ऑक्सीजन सिलिंडर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। हमारे शरीर का ऑक्सीजन लेवल 90 से ऊपर होता है। वो कहते हैं, "सबसे पहले मरीज का ऑक्सीजन लेवल ऑक्सीमीटर का इस्तेमाल कर चेक करें। हमारा ऑक्सीजन लेवल 95 से ऊपर होना चाहिए। लेकिन, यदि मरीज का ऑक्सीजन लेवल 94 से कम है और उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही है। तो हम ऑक्सीजन सपोर्ट दे सकते हैं। ऑक्सीजन रिलीज करने के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर की नॉब को सिलेंडर के साथ में लगे वाटर बॉटल के एक नंबर से तीन नंबर प्रेशर से ऑक्सीजन रिलीज करें। यहां से लीटर में ऑक्सीजन रिलीज होता है। जिस बात का ध्यान रखना होता है और उस वक्त मरीज की ऊंगली में ऑक्सीमीटर लगा होना चाहिए। जब तय 94 लेवल पर ऑक्सीजन सेचुरेशन पहुंच जाए, तो हमें ये देखना होगा कि किस नंबर पर ये लेवल पहुंचा।"

ऑक्सीमीटर के बिना हम ऑक्सीजन लेवल को नहीं माप सकते हैं। लेकिन, कुछ गतिविधियां कर हम ये अनुमान लगा सकते हैं कि हमारा ऑक्सीजन लेवल ठीक है या नहीं। डॉ. वेद प्रकाश गांव में बढ़ते संक्रमण पर चिंता जताते हुए कहते हैं, "ग्रामीण भारत तक स्वास्थ्य व्यवस्था आज के दौर में भी दुर्लभ है। इसके लिए लोगों को खुद सचेत होना होगा और कोविड प्रोटोकॉल का पालन करना होगा। यदि कोई व्यक्ति 5-6 मिनट में 500 मीटर बिना रूके और थके चल लेता है तो उसके ऑक्सीजन लेवल में कोई दिक्कत नहीं है। उनमें निमोनिया के लक्षण शुरू हो रहे हैं जिसकी अंगुलियां नीली पड़ने लगे। एक्स-रे से भी ये पूरा स्पष्ट हो जाता है।"

लक्षण और इलाज

डॉ. अभिषेक बताते हैं कि ब्‍लैक फंगस नाक और साइनस के माध्‍यम से प्रवेश करता है और आंख पर हमला करने के बाद दिमाग को अपनी जद में ले लेता है। संक्रमण के दो-चार दिनों भीतर ही सिर में तेज दर्द होता है, आंख की पलक सूज जाती है। आंख का मूवमेंट बंद हो जाता है। एक तरफ चेहरा सुन्‍न हो जाता है, काला होने लगता है। आंख की रोशनी चली जाती है। प्रारंभिक लक्ष्‍ण के साथ इलाज प्रारंभ होने पर रोशनी बचाई जा सकती है। आंख के डॉक्‍टर के पास जाने के बदले सीधा ईएनटी एक्‍सपर्ट के पास जाना चाहिए। इनके यहां इलाज के लिए आये चार लोगों ने बताया कि उनके आंख की रोशनी चली गई है। किसी की दो दिन में गई, किसी की चार-छह दिनों में।

चिकित्‍सकों के अनुसार ब्‍लैक फंगस का इलाज है। बशर्ते तुरंत शुरू किया जाये। इंफोटेरेसिन बी, पोसाकोनाजोल इलाज में काम आता है। इंफोटेरेसिन बी की तो अब कालाबाजारी होने लगी है। एक्‍स रे और सीटी स्‍कैन से रोग की पहचान होती है। इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की गाइड लाइन के अनुसार स्‍टेरॉयड की इस्‍तेमाल डॉक्‍टरों के परामर्श से ही लें। एंटी फंगल दवाएं अपने मन से न लें। इम्‍युनिटी बुस्‍टर दवाओं का ज्‍यादा दिनों तक इस्‍तेमाल न करें। शुगर के मरीज अपना शुगर नियंत्रित रखें।

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